Greenland Dispute: ट्रंप का ग्रीनलैंड पर सख्त रुख: 'प्यार से या जबरदस्ती, हम इसे लेकर रहेंगे'

Greenland Dispute - ट्रंप का ग्रीनलैंड पर सख्त रुख: 'प्यार से या जबरदस्ती, हम इसे लेकर रहेंगे'
| Updated on: 10-Jan-2026 08:28 AM IST
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर अपने सख्त तेवर दिखाए हैं, यह स्पष्ट करते हुए कि अमेरिका इस विशाल द्वीप को अपने कब्जे में लेने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि यह अधिग्रहण 'प्यार से' हो या 'जबरदस्ती', अमेरिका इसे हासिल करेगा। ट्रंप ने अपने इस रुख के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता का। हवाला दिया, विशेष रूप से रूस और चीन से बढ़ते खतरों को देखते हुए। उन्होंने यूरोपीय देशों को आगाह किया कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका का नियंत्रण आवश्यक है ताकि इसे प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के हाथों में जाने से रोका जा सके।

ग्रीनलैंड पर कब्जे की अमेरिकी मंशा

वॉशिंगटन डीसी में तेल और गैस क्षेत्र के प्रमुख कारोबारियों के साथ एक बैठक के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए, राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड के भविष्य पर अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर कोई कदम नहीं उठाता है, तो रूस या चीन जैसे देश इस पर कब्जा कर सकते हैं। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका रूस या चीन को अपना पड़ोसी नहीं बनाना चाहता, और इसलिए ग्रीनलैंड का अधिग्रहण एक रणनीतिक आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह कदम अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, और वह इसे शांतिपूर्ण तरीके से पूरा करना पसंद करेंगे, लेकिन अगर ऐसा संभव नहीं हुआ तो अन्य विकल्प भी खुले हैं और यह बयान अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हलचल पैदा करने वाला है, क्योंकि यह एक संप्रभु क्षेत्र पर संभावित अधिग्रहण की बात करता है।

रूस और चीन से संभावित खतरा

ट्रंप ने डेनमार्क के प्रति अपनी प्रशंसा व्यक्त करते हुए भी ग्रीनलैंड पर उसके ऐतिहासिक दावे को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वह डेनमार्क के बड़े प्रशंसक हैं और उन्होंने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया है, लेकिन केवल 500 साल पहले एक नाव से वहां पहुंचने के कारण डेनमार्क को उस जमीन का मालिकाना हक नहीं मिल जाता। ट्रंप के इस बयान ने डेनमार्क के साथ संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है, जो ग्रीनलैंड को अपना अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र मानता है। उनका तर्क है कि आधुनिक भू-राजनीति में ऐतिहासिक दावे उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितने कि वर्तमान रणनीतिक आवश्यकताएं। यह टिप्पणी डेनमार्क की संप्रभुता और उसके क्षेत्रों पर उसके अधिकार को सीधे चुनौती देती है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड के आसपास रूस और चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की और उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड के आसपास रूसी विध्वंसक जहाज, चीनी विध्वंसक जहाज और बड़ी-बड़ी रूसी पनडुब्बियां मौजूद हैं। इस स्थिति को देखते हुए, ट्रंप का मानना है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड पर कब्जा करना होगा ताकि इन शक्तियों को वहां पैर जमाने से रोका जा सके। उनका तर्क है कि अगर अमेरिका इस क्षेत्र पर नियंत्रण नहीं करता है, तो रूस या चीन। निश्चित रूप से ऐसा करेंगे, जिससे उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा हितों को खतरा होगा। यह बयान आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को रेखांकित करता है, जहां कई देश संसाधनों और रणनीतिक मार्गों पर नियंत्रण के लिए होड़ कर रहे हैं।

मालिकाना हक बनाम लीज: एक रणनीतिक अंतर

जब ट्रंप से पूछा गया कि ग्रीनलैंड का 'मालिक' बनना क्यों आवश्यक है, जबकि अमेरिका वहां अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा सकता है, तो उन्होंने मालिकाना हक और लीज के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बताया और ट्रंप ने कहा कि मालिकाना हक की रक्षा अलग तरीके से होती है, जबकि लीज की रक्षा वैसे नहीं की जाती। उनके अनुसार, देशों को क्षेत्रों का मालिकाना हक होना चाहिए ताकि वे उनकी प्रभावी ढंग से रक्षा कर सकें। उन्होंने जोर देकर कहा कि आप लीज की रक्षा उसी तरह नहीं करते जैसे आप अपने स्वामित्व वाले क्षेत्र की करते हैं और यह तर्क अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीतिक नियंत्रण और सुरक्षा सुनिश्चित करने की इच्छा को दर्शाता है, जहां केवल सैन्य उपस्थिति पर्याप्त नहीं मानी जाती है।

प्राकृतिक संसाधनों का महत्व

ग्रीनलैंड केवल एक रणनीतिक सैन्य चौकी नहीं है, बल्कि यह दुर्लभ पृथ्वी खनिज, यूरेनियम और लोहे जैसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों से भी भरपूर है। इन संसाधनों का वैश्विक अर्थव्यवस्था और आधुनिक प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण स्थान है, विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उद्योगों में। ट्रंप प्रशासन की ग्रीनलैंड को हासिल करने की कोशिशों के पीछे इन संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त करने की इच्छा भी एक प्रमुख कारक हो सकती है और इन खनिजों तक पहुंच अमेरिका को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक महत्वपूर्ण लाभ प्रदान कर सकती है और चीन पर निर्भरता कम कर सकती है, जो वर्तमान में कई दुर्लभ पृथ्वी खनिजों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है।

NATO और अमेरिकी नेतृत्व पर ट्रंप का दृष्टिकोण

ट्रंप ने NATO के प्रति अपने समर्थन को दोहराया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अगर वह नहीं होते तो NATO का अस्तित्व नहीं होता। उन्होंने कहा कि NATO को यह समझना चाहिए कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर चीन या रूस को कब्जा नहीं करने देगा और यह बयान NATO सहयोगियों पर अपनी सुरक्षा जिम्मेदारियों को गंभीरता से लेने और अमेरिकी नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए दबाव डालने की उनकी लगातार कोशिशों का हिस्सा है। ट्रंप का मानना है कि अमेरिका को अपने हितों की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाने चाहिए, भले ही इसके लिए पारंपरिक कूटनीतिक मानदंडों से हटना पड़े। ग्रीनलैंड पर उनका रुख उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' विदेश नीति का एक। और उदाहरण है, जहां अमेरिकी हितों को सर्वोपरि रखा जाता है।

आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

ग्रीनलैंड पर ट्रंप का बयान आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को उजागर करता है। आर्कटिक क्षेत्र, अपने विशाल प्राकृतिक संसाधनों और नए शिपिंग मार्गों के खुलने की। संभावना के कारण, वैश्विक शक्तियों के लिए तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। रूस ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है, और चीन भी 'ध्रुवीय रेशम मार्ग' के माध्यम से अपनी आर्थिक और रणनीतिक पहुंच का विस्तार करना चाहता है और ऐसे में, ग्रीनलैंड का रणनीतिक स्थान, जो उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है, इसे एक अत्यंत वांछनीय संपत्ति बनाता है। अमेरिका का ग्रीनलैंड पर नियंत्रण आर्कटिक में शक्ति संतुलन को महत्वपूर्ण रूप से। प्रभावित कर सकता है और भविष्य की भू-राजनीतिक गतिशीलता को आकार दे सकता है।

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