तुर्की ने ब्रिक्स (BRICS) समूह में पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को एक बार फिर गति दी है। अंकारा ने सेल्कुक उनाल को चीन में अपना नया राजदूत नियुक्त किया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है और यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब तुर्की वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मंच पर अपनी भूमिका को विस्तार देने के लिए उभरती अर्थव्यवस्थाओं के इस समूह के साथ जुड़ने का प्रयास कर रहा है। साल 2024 में औपचारिक आवेदन देने के बावजूद तुर्की को पूर्ण सदस्यता के बजाय केवल 'पार्टनर कंट्री' का दर्जा दिया गया था, जिसके बाद अब चीन के माध्यम से नए सिरे से प्रयास शुरू किए गए हैं।
बीजिंग में नई कूटनीतिक रणनीति और राजदूत की भूमिका
चीन में तुर्की के नए राजदूत सेल्कुक उनाल ने कार्यभार संभालने के बाद स्पष्ट किया कि उनकी प्राथमिकता व्यापार, निवेश और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना है। राजनयिक सूत्रों के अनुसार, उनाल की नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य बीजिंग के साथ राजनीतिक विश्वास को गहरा करना है, जो ब्रिक्स में तुर्की के प्रवेश के लिए एक महत्वपूर्ण समर्थक हो सकता है। तुर्की और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों में हाल के वर्षों में काफी सुधार देखा गया है। उनाल ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया है, ताकि दोनों देशों के बीच संवेदनशील मुद्दों पर संवाद का एक मजबूत आधार तैयार किया जा सके।
नाटो सदस्यता और ब्रिक्स के बीच संतुलन की चुनौती
तुर्की की ब्रिक्स सदस्यता की राह में सबसे बड़ी चुनौती उसकी उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) की सदस्यता मानी जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, ब्रिक्स को अक्सर पश्चिमी प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखा जाता है। नाटो का एक प्रमुख सदस्य होने के नाते, तुर्की का ब्रिक्स में शामिल होना भू-राजनीतिक जटिलताएं पैदा करता है। हालांकि, अंकारा का आधिकारिक रुख यह है कि वह एक बहुपक्षीय विदेश नीति का पालन कर रहा है, जहां वह पश्चिम के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को बनाए रखते हुए पूर्व की उभरती शक्तियों के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहता है। 2024 के कज़ान शिखर सम्मेलन में तुर्की को पूर्ण सदस्यता न मिलना इसी कूटनीतिक खींचतान का परिणाम माना गया था।
आर्थिक सहयोग और $50 बिलियन का व्यापारिक लक्ष्य
चीन वर्तमान में एशिया में तुर्की का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार का आंकड़ा लगभग $50 बिलियन के करीब पहुंच चुका है। हालांकि, तुर्की के लिए व्यापार घाटा एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है, क्योंकि वह चीन से आयात अधिक करता है और निर्यात कम। अंकारा की रणनीति चीनी निवेश को परिवहन, नवीकरणीय ऊर्जा, उच्च तकनीक और कृषि जैसे क्षेत्रों में आकर्षित करने की है। ब्रिक्स की सदस्यता मिलने से तुर्की को 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) तक पहुंच प्राप्त होगी, जिससे उसे अपनी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक वित्त पोषण के स्रोत मिल सकते हैं।
बेल्ट एंड रोड पहल और मिडिल कॉरिडोर का महत्व
तुर्की, चीन की महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) में एक रणनीतिक कड़ी के रूप में कार्य करता है। तुर्की द्वारा विकसित 'मिडिल कॉरिडोर' परियोजना चीन को यूरोप से जोड़ने वाला एक छोटा और सुरक्षित मार्ग प्रदान करती है। भौगोलिक रूप से यूरोप और एशिया के चौराहे पर स्थित होने के कारण, तुर्की खुद को एक वैश्विक लॉजिस्टिक हब के रूप में पेश कर रहा है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि तुर्की ब्रिक्स का हिस्सा बनता है, तो यह न केवल उसके आर्थिक हितों को सुरक्षित करेगा बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उसकी स्थिति को भी और अधिक प्रभावशाली बना देगा।
सुरक्षा संवाद और क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव
बीजिंग और अंकारा के बीच सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी प्रयासों पर भी चर्चा तेज हुई है। उइगर मुस्लिम समुदाय जैसे संवेदनशील मुद्दों पर तुर्की ने हाल के वर्षों में अधिक संतुलित और संवाद-आधारित दृष्टिकोण अपनाया है, ताकि आर्थिक संबंधों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। वैश्विक राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच, तुर्की खुद को 'ग्लोबल साउथ' की एक मजबूत आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है। ब्रिक्स में शामिल होने की उसकी कोशिशें इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य वैश्विक शासन संरचना में अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त करना है।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण और भविष्य की राह
राजनयिक विश्लेषकों के अनुसार, तुर्की की ब्रिक्स सदस्यता केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक स्वायत्तता की तलाश है। हालांकि रूस और चीन ने तुर्की की रुचि का स्वागत किया है, लेकिन समूह के भीतर सर्वसम्मति बनाना एक लंबी प्रक्रिया हो सकती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तुर्की अपनी नाटो प्रतिबद्धताओं और ब्रिक्स की आकांक्षाओं के बीच कैसे संतुलन बनाता है। फिलहाल, चीन में नए राजदूत की सक्रियता यह संकेत देती है कि अंकारा इस दिशा में पीछे हटने के मूड में नहीं है और अपनी दावेदारी को हर संभव मंच पर मजबूती से रखने के लिए तैयार है।