दुनिया में जारी तेल संकट के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा फैसला लिया है। यूएई पेट्रोलियम देशों के समूहों ओपेक (OPEC) और ओपेक+ (OPEC+) से बाहर हो गया है। यूएई के ऊर्जा मंत्री ने इस फैसले की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि यह निर्णय पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से लिया गया था और इसके लिए सऊदी अरब सहित किसी अन्य देश के साथ कोई प्रत्यक्ष परामर्श नहीं किया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यूएई अपना फैसला खुद लेने में सक्षम है।
स्वतंत्र निर्णय और सऊदी अरब पर प्रभाव
ईरान से बढ़ते तनाव और खाड़ी परिषद (GCC) के साथ चल रहे मतभेदों के बीच यूएई का यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है और यूएई के इस फैसले से ओपेक के वास्तविक नेता माने जाने वाले सऊदी अरब को बड़ा झटका लग सकता है। ओपेक के पुराने सदस्य के रूप में यूएई के जाने से संगठन के भीतर गड़बड़ी होने की संभावना है और यह समूह कमजोर हो सकता है। यह संगठन आमतौर पर जियोपॉलिटिक्स से लेकर उत्पादन कोटा तक के आंतरिक मतभेदों के बावजूद एकजुटता दिखाने का प्रयास करता रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और क्षेत्रीय चुनौतियां
ओपेक देश पहले से ही ईरान की धमकियों और जहाजों पर होने वाले हमलों के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के माध्यम से निर्यात भेजने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। होर्मुज ईरान और ओमान के बीच एक संकरा रास्ता है, जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा कच्चा तेल और लिक्विफाइड नैचुरल गैस का कारोबार होता है। पहले से ही होर्मुज की बंदी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे ओपेक के लिए यूएई का अलग होना एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
यूएई सरकार का आधिकारिक रुख
यूएई सरकार के अनुसार, यह निर्णय देश की उत्पादन नीति और उसकी वर्तमान तथा भविष्य की क्षमता की व्यापक समीक्षा के बाद लिया गया है। सरकार का कहना है कि यह फैसला उनके राष्ट्रीय हित और बाजार की तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने में प्रभावी ढंग से योगदान देने की प्रतिबद्धता पर आधारित है। ऊर्जा मंत्री ने दोहराया कि यह निर्णय किसी बाहरी दबाव के बिना लिया गया है।
डोनाल्ड ट्रंप और ओपेक का इतिहास
ओपेक से यूएई का बाहर निकलना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है और ट्रंप ने पहले भी इस संगठन पर तेल की कीमतें बढ़ाकर ‘बाकी दुनिया को लूटने’ का आरोप लगाया है और वे इस समूह को कमजोर करना चाहते हैं, जिसमें रूस और सऊदी अरब का वर्चस्व है।
ओपेक और ओपेक प्लस की संरचना
तेल उत्पादन और बिक्री की नीति तैयार करने के लिए ओपेक की स्थापना साल 1960 में की गई थी। शुरुआत में इसमें इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला शामिल थे। वर्तमान में इस संगठन में सऊदी अरब, इराक, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), लीबिया, इंडोनेशिया, कुवैत, नाइजीरिया और वेनेजुएला शामिल हैं। ओपेक प्लस देशों में इन 12 सदस्यों के अलावा 10 और देश शामिल हैं, जिनमें रूस, अजरबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, कजाकिस्तान, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान और दक्षिण सूडान के नाम शामिल हैं।