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यूएन एनपीटी बैठक: अमेरिका के भारी विरोध के बावजूद ईरान बना उपाध्यक्ष, 121 देशों का मिला समर्थन

यूएन एनपीटी बैठक: अमेरिका के भारी विरोध के बावजूद ईरान बना उपाध्यक्ष, 121 देशों का मिला समर्थन
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संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) की एक महीने तक चलने वाली महत्वपूर्ण बैठक की शुरुआत हो गई है और इस बैठक के आरंभ में ही संगठनात्मक ढांचे के लिए चुनाव प्रक्रिया संपन्न हुई, जिसमें 34 देशों के प्रतिनिधियों को उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया है। इन निर्वाचित उपाध्यक्षों में ईरान का नाम भी शामिल है, जिसे अमेरिका के कड़े और भारी विरोध के बावजूद यह पद प्राप्त हुआ है। एनपीटी की नियमावली के अनुसार, हर 5 साल पर एक अध्यक्ष और 34 उपाध्यक्षों का चुनाव किया जाता है। इस बार अध्यक्ष की प्रतिष्ठित कुर्सी वियतनाम को मिली है, जिसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चीन और रूस का करीबी सहयोगी माना जाता है।

अमेरिका का विरोध और 121 देशों का समर्थन

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने ईरान को इस पद पर पहुंचने से रोकने के लिए अंतिम क्षणों तक अपनी पूरी कूटनीतिक ताकत लगा दी थी। हालांकि, अमेरिका के इन प्रयासों के विपरीत ईरान को 121 देशों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ, जिसके चलते वह उपाध्यक्ष का पद हासिल करने में सफल रहा। ईरान ने इस अवसर पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उसके नेता ने हमेशा परमाणु हथियारों का विरोध किया है और अमेरिका इस मुद्दे पर पूरी दुनिया में केवल झूठ फैला रहा है और परमाणु अप्रसार संधि के वर्तमान अध्यक्ष हेंग वियत के अनुसार, गुट निरपेक्ष देशों ने ईरान की उम्मीदवारी का पुरजोर समर्थन किया। हालांकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अमेरिका जैसे देशों ने इसका विरोध किया, लेकिन उनका विरोध ईरान को उपाध्यक्ष बनने से रोकने में कारगर साबित नहीं हो सका।

अमेरिका ने फैसले को बताया एनपीटी का अपमान

अमेरिकी शस्त्र नियंत्रण और अप्रसार ब्यूरो के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने अपने एक आधिकारिक बयान में ईरान के चयन को एनपीटी के लिए एक 'अपमान' करार दिया। येव के मुताबिक, ईरान ने लंबे समय से परमाणु अप्रसार नीति की प्रतिबद्धताओं के प्रति अपनी अवमानना प्रदर्शित की है, ऐसे में उसका इस पद के लिए चुना जाना बेहद शर्मनाक है। उन्होंने आगे चेतावनी देते हुए कहा कि यह एक कलंक करने वाला फैसला है, जिससे एनपीटी जैसी संस्था की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो सकती है। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में ईरान के दूत रजा नजाफी ने अमेरिका की नियत पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

ईरान का पलटवार और एनपीटी के लक्ष्य

रजा नजाफी ने पलटवार करते हुए कहा कि अमेरिका दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसने वास्तव में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया है, इसलिए उसे इस विषय पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है और उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका अपने परमाणु शस्त्रागार का लगातार विस्तार कर रहा है। परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी की स्थापना 1970 में शीतयुद्ध के चरम के दौरान परमाणु हमले के बढ़ते खतरों को देखते हुए की गई थी। यह संगठन संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में कार्य करता है और इसका मुख्य उद्देश्य विश्व को परमाणु युद्ध की विभीषिका से बचाना है।

परमाणु अप्रसार संधि वैश्विक सुरक्षा ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह संगठन 1970 से ही दुनिया को परमाणु हमले के खतरे से बचाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है और इसके 190 से ज्यादा सदस्य देश इन निर्धारित उद्देश्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हैं।

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