ईरान को अमेरिका के अछूते बंकर बस्टर बम मिलने से भू-राजनीति गरमा गई है और ईरान इन बमों की रिवर्स इंजीनियरिंग कर अमेरिकी सैन्य तकनीक जान सकता है, जिससे वह अपने रक्षा तंत्र को और अधिक मजबूत करेगा। सबसे बड़ा खतरा चीन-ईरान गठबंधन से उत्पन्न हो रहा है, जहां ईरान यह संवेदनशील तकनीक चीन को सौंप सकता है। इससे चीन अमेरिका के खिलाफ एक अजेय कवच बना सकता है, जिससे अमेरिका को भविष्य में बड़ा सामरिक नुकसान होने की आशंका है। ईरान पर हमला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर एक बड़ी गलती साबित हो रहा है और ट्रंप अपनी ही बिछाई बिसात में उलझ गए हैं, लेकिन यह युद्ध के असर का वह हिस्सा है जो आशंका पर आधारित है। ईरान का एक दावा बता रहा है कि ट्रंप के युद्ध छेड़ने के फैसले ने पूरी अमेरिकी सेना और उनकी रिसर्च टीम के लिए बड़ा संकट पैदा कर दिया है।
अमेरिकी हथियारों की तकनीक और घातक विशेषताएं
ईरान का रक्षा तंत्र और न्यूक्लियर केंद्रों की सुरक्षा
ईरान इन मिले हुए बंकर बस्टर बमों का इस्तेमाल अपनी ढाल बनाने के लिए कर सकता है। इन बमों के अध्ययन के आधार पर ही ईरान अब अपने न्यूक्लियर केंद्रों का सरफेस तैयार करेगा। यह संरचना इतनी मजबूत होगी कि कंक्रीट और आयरन की लेयर में ही बम फंस जाएगा और 100 मीटर की गहराई में स्थित न्यूक्लियर केंद्र पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। इससे यूरेनियम संवर्धन हॉल का काम प्रभावित नहीं होगा। इतना बड़ा बम गिरने के बावजूद वेंटिलेशन शॉफ्ट भी सामान्य रूप से काम करते रहेंगे और मुख्य हॉल में रखे संवर्धित यूरेनियम को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। अमेरिका के लिए संकट सिर्फ यह नहीं है कि ईरान अब अमेरिकी हथियारों के अनुसार मजबूत ढाल बनाकर टक्कर देगा, बल्कि इससे भी बड़ा संकट अमेरिका जैसे घातक हथियारों का निर्माण है।
रिवर्स इंजीनियरिंग और सैन्य तकनीक का खतरा
अगर अमेरिका के जिंदा घातक हथियार ईरान के हाथ लग गए हैं, तो इसका अंजाम घातक होगा। ये सिर्फ धातु के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके अंदर अमेरिका की सैन्य तकनीक और अमेरिकी वैज्ञानिकों की दशकों की रिसर्च बंद है। अगर ईरान इन हथियारों की ‘रिवर्स इंजीनियरिंग’ करने में कामयाब हो जाता है तो खेल पूरी तरह पलट जाएगा। ईरान यह जान जाएगा कि GBU-57 बंकर बस्टर कितनी गहराई तक धंस सकता है और कितनी तरह की धातुओं को काटकर अंदर विस्फोट कर सकता है। इसी आधार पर वह अपने न्यूक्लियर ठिकानों का डिफेंस मैकेनिज्म मजबूत कर लेगा। इसके अलावा ईरान खुद इस तकनीक का इस्तेमाल कर बंकर बस्टर बम बना लेगा, जिससे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी और इजरायल के अंडरग्राउंड बेस तबाह किए जा सकते हैं।
चीन-ईरान गठबंधन और ड्रैगन की लैब का खेल
ईरान और चीन के बीच गुप्त रक्षा करार है जिसके तहत चीन ईरान को HQ-16 मिसाइल बैटरियां और HQ-17AE मिसाइल बैटरियां सप्लाई करता है। ईरान खुद ड्रोन बनाता है, लेकिन उसके कंपोनेंट्स चीन से हासिल करता है। कुछ रेडी-टू-यूज आत्मघाती ड्रोन और हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक भी ईरान ने चीन से ही हासिल की है। इन मिसाइलों के लिए केमिकल भी चीन ही सप्लाई करता है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और रडार सिस्टम भी ईरान चीन से प्राप्त करता है, जिसके बदले में वह चीन को ऑयल देता है और युआन में व्यापार को बढ़ावा देता है। अब युद्धकाल में ईरान जिंदा मिले अमेरिकी हथियार भी चीन को दे सकता है।
अमेरिकी हथियारों के जिंदा मिलने की कहानी में सबसे खौफनाक पहलू चीन है, क्योंकि कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि ईरान GBU-57 बम और अमेरिकी क्रूज मिसाइलों का ब्लूप्रिंट चीन को सौंप सकता है। यदि ऐसा हुआ, तो अमेरिकी सैन्य सीक्रेट सीधे बीजिंग पहुंच जाएंगे और चीन अमेरिका के खिलाफ एक अभेद्य कवच तैयार कर लेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगता है कि चीन शायद मदद कर रहा है लेकिन वह ज्यादा नहीं सोचते, चीन इससे भी बदतर हो सकता था। ट्रंप 14-15 मई को बीजिंग में शी जिनपिंग से मिलने वाले हैं। युद्धविराम का माहौल तैयार है, लेकिन असली युद्ध अभी बाकी है, जो ईरान और चीन की लैब से शुरू होगा।