विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए नियमों ने देश के शैक्षणिक और प्रशासनिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना विनियम, 2026' (UGC Promotion of Equity Regulations, 2026) के लागू होते ही विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। इस विवाद का असर इतना गहरा है कि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने। इन नियमों को भेदभावपूर्ण बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। आखिर इन नियमों में ऐसा क्या है जिसे लेकर छात्र, शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी आमने-सामने हैं?
क्या है यूजीसी का नया नियम और इसकी पृष्ठभूमि?
इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2016 के चर्चित रोहित वेमुला मामले से जुड़ी हैं और हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर गरमाया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी को निर्देश दिया था कि वे कैंपस में होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए कड़े नियम बनाएं। इसी आदेश के अनुपालन में यूजीसी ने नए नियमों का ड्राफ्ट तैयार किया और अब इसे लागू करने की तैयारी है।
ओबीसी का समावेश और विवाद की मुख्य वजह
शुरुआती ड्राफ्ट में भेदभाव से सुरक्षा के दायरे में केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को रखा गया था। हालांकि, बाद में दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली शिक्षा संबंधी संसदीय समिति ने सिफारिश की। कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों को भी इस सुरक्षा घेरे में लाया जाना चाहिए। नए नियमों में अब एससी और एसटी के साथ-साथ ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है। विरोध करने वालों का कहना है कि यह बदलाव राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है और इससे कैंपस में गुटबाजी बढ़ेगी।
इक्विटी कमेटी का गठन और संरचना पर सवाल
नए नियमों के तहत हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक 'इक्विटी कमेटी' बनाना अनिवार्य होगा और इस कमेटी का काम कैंपस में होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव की जांच करना होगा। विवाद इस बात पर है कि कमेटी में एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों का होना तो अनिवार्य है, लेकिन सामान्य वर्ग (General Category) के लिए कोई प्रतिनिधित्व तय नहीं किया गया है। आलोचकों का तर्क है कि बिना सामान्य वर्ग के सदस्य के, किसी भी मामले की जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती।
सख्त कार्रवाई और 24 घंटे का डेडलाइन
यूजीसी ने इन नियमों को बेहद सख्त बनाया है। संस्थान के प्रमुख की अध्यक्षता वाली यह कमेटी शिकायत मिलने के मात्र 24 घंटे के भीतर कार्रवाई शुरू करने के लिए बाध्य होगी। इतना ही नहीं, 15 दिनों के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट सौंपनी होगी। संस्थानों को 24/7 हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल भी शुरू करना होगा और यदि कोई यूनिवर्सिटी इन नियमों का पालन करने में विफल रहती है, तो यूजीसी उसकी डिग्री देने की शक्ति छीन सकता है या मिलने वाले अनुदान (Grants) को रोक सकता है।
दुरुपयोग का डर और सजा के प्रावधान में बदलाव
विरोध का एक बड़ा कारण नियमों के दुरुपयोग की आशंका है। पुराने नियमों में झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ सजा का प्रावधान था, जिसे नए नियमों से हटा दिया गया है और जानकारों का मानना है कि इससे निजी रंजिश निकालने के लिए झूठी शिकायतों की बाढ़ आ सकती है। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट का इस्तीफा भी इसी चिंता को दर्शाता। है कि ये नियम प्रशासनिक व्यवस्था में असंतुलन पैदा कर सकते हैं।
सरकार और यूजीसी का पक्ष
दूसरी ओर, सरकार और यूजीसी के अधिकारियों का कहना है कि उच्च शिक्षा में। ओबीसी छात्रों के साथ होने वाले सूक्ष्म भेदभाव (Micro-aggression) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि एक समावेशी वातावरण बनाने के लिए सभी वंचित वर्गों को सुरक्षा देना आवश्यक है और यह नियम केवल दंड देने के लिए नहीं, बल्कि कैंपस में समानता और भाईचारे का माहौल बनाने के लिए लाए गए हैं।