अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रूस पर प्रतिबंधों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक में संशोधनों पर चर्चा हो रही है, जिसका भारत और अन्य प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा असर पड़ सकता है और इन प्रस्तावित बदलावों का मुख्य उद्देश्य रूस के राजस्व के प्राथमिक स्रोतों, विशेष रूप से कच्चे तेल के व्यापार को निशाना बनाकर मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है। वाशिंगटन का यह स्पष्ट मानना है कि रूस का कच्चा तेल व्यापार यूक्रेन के खिलाफ जारी सैन्य अभियानों के लिए धन जुटाने में मदद कर रहा है। इस स्थिति से निपटने के लिए, एक नया प्रस्ताव पेश किया गया है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के शीर्ष तेल व्यापारिक साझेदारों, जिनमें भारत और चीन शामिल हैं, पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का अधिकार देने की मांग करता है।
प्रतिबंध विधेयक की विधायी यात्रा
यह विधेयक, जिसे लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट के नाम से जाना जाता है, पहले ही अमेरिकी सीनेट में एक बड़ी बाधा पार कर चुका है। पिछले महीने, सीनेट ने इस कानून को 86 और 11 वोटों के निर्णायक अंतर से पारित किया था। अब यह विधेयक आगे के विचार और संभावित संशोधनों के लिए हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के पास पहुंच गया है। हालांकि, विधायी प्रक्रिया के लिए समय बहुत कम है। 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों के कारण सदन जल्द ही अवकाश पर जाने वाला है। सांसदों के पास इस महत्वपूर्ण कानून पर काम पूरा करने के लिए केवल 4 दिन बचे हैं। इस सीमित समय के दौरान कई ऐसे संशोधन पेश किए गए हैं जो प्रतिबंधों के दायरे को पूरी तरह बदल सकते हैं।
100 फीसदी टैरिफ और लक्षित देशों की सूची
सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक डेमोक्रेटिक कांग्रेसी स्टेनी होयर द्वारा पेश किया गया है। इस संशोधन में स्पष्ट रूप से उन कई देशों के नाम लिए गए हैं जिन्हें ऊर्जा क्षेत्र में रूस का प्रमुख व्यापारिक साझेदार माना जाता है। इस सूची में भारत, चीन, तुर्की, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिज गणराज्य शामिल हैं। इस प्रस्ताव के तहत, यदि ये देश रूस के साथ अपना व्यापक तेल व्यापार जारी रखते हैं, तो उन्हें अपने निर्यात पर 100 फीसदी ड्यूटी का सामना करना पड़ सकता है। यह सीनेट द्वारा 7 अगस्त को पारित संस्करण से अलग है, जिसमें विशिष्ट देशों के नाम नहीं थे, बल्कि केवल मात्रा के हिसाब से तेल और गैस के 5 सबसे बड़े आयातकों का उल्लेख किया गया था।
शैडो फ्लीट पर नकेल कसने की तैयारी
इस विधायी कदम का प्राथमिक लक्ष्य रूस के ऊर्जा क्षेत्र को सहारा देने वाले वित्तीय ढांचे को ध्वस्त करना है। इसमें मुख्य ध्यान जहाजों के तथाकथित शैडो फ्लीट यानी गुप्त बेड़े पर है। अमेरिका का दावा है कि इन जहाजों का उपयोग मौजूदा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और मूल्य सीमाओं को दरकिनार कर रूसी तेल की डिलीवरी के लिए किया जाता है। व्यापारिक साझेदारों और तेल वितरण के रसद को निशाना बनाकर, वाशिंगटन को उम्मीद है कि वह युद्ध के लिए मॉस्को को उपलब्ध होने वाले फंड में भारी कमी ला सकेगा। राष्ट्रपति को 100 फीसदी टैरिफ लगाने की शक्ति देने के प्रस्ताव को एक शक्तिशाली हथियार के रूप में देखा जा रहा है ताकि अन्य देशों को रूस के ऊर्जा निर्यात में मदद करने से हतोत्साहित किया जा सके।
आंतरिक विरोध और वैकल्पिक प्रस्ताव
सभी अमेरिकी सांसद व्यापक टैरिफ शक्तियों के पक्ष में नहीं हैं। डेमोक्रेटिक कांग्रेसी ग्रेगरी मीक्स राष्ट्रपति को माध्यमिक टैरिफ लगाने के इतने व्यापक अधिकार देने के मुखर विरोधी बनकर उभरे हैं। मीक्स ने विधेयक की धारा 113 को पूरी तरह से हटाने के लिए एक संशोधन पेश किया है। यही वह विशेष धारा है जो राष्ट्रपति को रूस के व्यापारिक साझेदारों पर बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाने का कानूनी ढांचा प्रदान करेगी। मीक्स के इस संशोधन को सदन में 3 सह-प्रायोजकों का समर्थन मिला है। उनका विरोध रणनीतिक साझेदारों के खिलाफ इस तरह के आक्रामक व्यापारिक उपायों से होने वाले संभावित आर्थिक और राजनयिक नुकसान की चिंताओं पर आधारित है।
छूट के प्रावधान और यूक्रेन के लिए वित्तीय सहायता
टैरिफ धारा का विरोध करने के अलावा, ग्रेगरी मीक्स ने विधेयक में अन्य संशोधनों का भी सुझाव दिया है। ऐसा ही एक संशोधन राष्ट्रपति को किसी विदेशी व्यक्ति पर लगे प्रतिबंधों को 90 दिन के लिए हटाने की अनुमति देगा, जिसे आगे भी 90 दिन के लिए बढ़ाया जा सकेगा, बशर्ते इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाए। इसके अतिरिक्त, मीक्स ने एक और संशोधन प्रस्तावित किया है जो यूक्रेन को रक्षा सामग्री और सेवाओं की खरीद के लिए 15 अरब डॉलर का सीधा कर्ज देने का अधिकार देगा। यह ऋण कीव को अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।
प्रतिनिधि सभा में आगे की राह
हाउस रूल्स कमेटी ने सोमवार को रूस प्रतिबंध कानून में किए गए इन संशोधनों को सार्वजनिक कर दिया। अब विधायी प्रक्रिया के अनुसार, राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजे जाने से पहले सदन में इन संशोधनों और अंतिम विधेयक पर मतदान होना बाकी है। इन हालिया संशोधनों ने अमेरिकी राजधानी में एक गहन बहस छेड़ दी है। चर्चा का मुख्य केंद्र यह है कि क्या भारत जैसे देशों पर संभावित टैरिफ के साथ आगे बढ़ा जाए या इस अधिकार को पूरी तरह खत्म कर यूक्रेन के लिए छूट और सीधे ऋण जैसे वैकल्पिक उपायों को अपनाया जाए। जैसे-जैसे 4 दिन की समय सीमा नजदीक आ रही है, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अमेरिकी सदन अपने भू-राजनीतिक उद्देश्यों और व्यापारिक संबंधों के बीच कैसे संतुलन बनाता है।