फारस की खाड़ी में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष गहराता जा रहा है। आधिकारिक रिपोर्टों और युद्ध क्षेत्र की गतिविधियों के अनुसार, अमेरिका अब अपनी रणनीति में बदलाव करने पर विचार कर रहा है। ईरान द्वारा अमेरिकी तेल टैंकरों और सैन्य ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद, वाशिंगटन में 'प्लान बी' पर चर्चा तेज हो गई है और इस संघर्ष में ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि वह अपने लक्ष्यों की प्राप्ति तक पीछे नहीं हटेगा।
ईरानी हमलों से अमेरिकी ठिकानों को नुकसान
युद्ध के मैदान से प्राप्त जानकारी के अनुसार, ईरान ने हाल के दिनों में अमेरिकी हितों पर कई प्रहार किए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने अमेरिका के दो तेल टैंकरों को निशाना बनाया है, जिससे उन्हें भारी क्षति हुई है। इसके अतिरिक्त, अरब क्षेत्र में स्थित लगभग 17 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी हमलों की खबरें आई हैं। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरंगें (माइन) बिछा दी हैं और अपने तटों पर लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात की हैं और ईरानी सेना अब बाब अल-मंदेब क्षेत्र में भी अपनी सक्रियता बढ़ाने की तैयारी में है, जिससे वैश्विक व्यापार मार्ग प्रभावित होने की आशंका है।
डोनाल्ड ट्रंप का दावा और सैन्य रणनीति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया बयानों में दावा किया है कि अमेरिकी सेना ईरान को तेजी से कमजोर कर रही है। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका ने पिछले 48 घंटों में ईरान के 54 जहाजों और 58 नौसैनिक जहाजों को नष्ट कर दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की नौसैनिक क्षमता और माइन लेयर्स को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्रालय ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका की 'सत्ता परिवर्तन' की रणनीति विफल हो गई है। ईरान का मानना है कि अमेरिका का 'प्लान ए' पूरी तरह नाकाम रहा है और अब वे वैकल्पिक योजनाओं की तलाश कर रहे हैं।
दाहिया डॉक्ट्रिन और 'प्लान बी' का क्रियान्वयन
रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप का 'प्लान बी' मुख्य रूप से 'दाहिया डॉक्ट्रिन' पर आधारित हो सकता है। यह एक सैन्य रणनीति है जिसमें दुश्मन के सैन्य ठिकानों के बजाय नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जाता है। इस योजना के तहत स्कूल, अस्पताल, गैस प्लांट और तेल डिपो जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों को लक्षित करने की तैयारी है। इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के भीतर मूलभूत सुविधाओं की कमी पैदा करना है, ताकि जनता में असंतोष बढ़े और सरकार के खिलाफ विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो सके। अमेरिका और इजराइल इस रणनीति के माध्यम से ईरान में आंतरिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं।
कुर्द लड़ाके और प्रॉक्सी युद्ध की संभावना
अमेरिका के नए इस्केप प्लान में कुर्द लड़ाकों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। योजना के अनुसार, ईरान के खिलाफ एक प्रॉक्सी युद्ध छेड़ने के लिए कुर्द लड़ाकों को संगठित किया जा सकता है। इससे ईरान को अपनी सीमाओं के भीतर ही उलझाए रखने की कोशिश की जाएगी। हालांकि, कुर्द समूहों और अमेरिका के बीच विश्वास की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। ऐतिहासिक रूप से कुर्द लड़ाकों को कई बार अमेरिकी समर्थन मिला और फिर वापस ले लिया गया, जिससे इस मोर्चे पर सफलता संदिग्ध मानी जा रही है।
इजराइल और नेतन्याहू पर पड़ने वाला प्रभाव
अमेरिका की इस बदलती रणनीति का सबसे बड़ा प्रभाव इजराइल पर पड़ने की संभावना है। यदि अमेरिका सीधे युद्ध से पीछे हटता है और केवल प्रॉक्सी या आर्थिक दबाव पर निर्भर रहता है, तो इजराइल के लिए सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं। बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में इजराइल ने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है, लेकिन अमेरिका के पीछे हटने की स्थिति में ईरान और उसके समर्थित संगठन जैसे हिजबुल्लाह और हूती इजराइल पर हमले तेज कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का 'प्लान बी' इजराइल को एक कठिन स्थिति में डाल सकता है, जहां उसे अकेले ही क्षेत्रीय मोर्चों पर मुकाबला करना पड़ सकता है।