विज्ञापन

ईरान अमेरिका डील: हस्ताक्षर के बाद भी क्यों अंतिम समझौते में लगेगा समय?

ईरान अमेरिका डील: हस्ताक्षर के बाद भी क्यों अंतिम समझौते में लगेगा समय?
विज्ञापन

ईरान और अमेरिका के बीच पिछले चार महीनों से जारी युद्ध एक हस्ताक्षर के साथ समाप्त हो गया है। इस समझौते में सैन्य अभियानों को पूरी तरह से बंद करने और वैश्विक आपूर्ति की जीवनरेखा माने जाने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को तुरंत खोलने का प्रावधान शामिल है। हालांकि जो डील साइन हुई है, उसमें सभी प्रमुख बिंदु शामिल हैं, लेकिन उनकी विस्तार से व्याख्या करने और समझौते को जमीन पर उतारने के लिए दोनों पक्षों के बीच अभी लंबी बातचीत का दौर चलेगा। इसके लिए 60 दिन की समयसीमा तय की गई है, जिससे स्पष्ट है कि शांति की राह अभी लंबी और चुनौतीपूर्ण है।

60 दिन की समयसीमा और चुनौतियां

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने 17 जून 2026 को एमओयू पर हस्ताक्षर करके दुनिया को राहत की खबर तो दी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक समझौता फाइनल होने में अभी महीनों का समय लग सकता है। लेबनान में अमेरिकन यूनिवर्सिटी के फेलो रमी खूरी का कहना है कि दोनों देशों के बीच विवाद इतने गहरे हैं कि 60 दिन की डेडलाइन भी कम पड़ सकती है। अब परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज जैसे विवादित मुद्दों पर आगे बढ़ने का रास्ता तय किया जाएगा। यह प्रक्रिया किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह है जहां दर्शक अंत का इंतजार कर रहे हैं।

समझौते के पेचीदा मुद्दे

अमेरिका और ईरान के बीच के विवाद बहुत जटिल हैं। इतिहास गवाह है कि दोनों देशों के बीच पिछली डील्स में बात महीनों की नहीं बल्कि वर्षों की रही है। इन तमाम बिंदुओं पर चर्चा के लिए विशेषज्ञों की टीमें काम करेंगी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 2015 की न्यूक्लियर डील

ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते का इतिहास काफी पुराना है। 2015 में जो न्यूक्लियर डील साइन हुई थी, उस पर बातचीत 2013 से ही शुरू हो गई थी। उस समझौते को जनवरी 2016 में लागू किया गया था, जिसे जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) कहा गया। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी थे। तब सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई भी जीवित थे। उस डील में अमेरिका और ईरान के अलावा चीन, रूस, फ्रांस, यूके और जर्मनी भी शामिल थे। हालांकि इजराइल और सऊदी अरब इस समझौते से खुश नहीं थे।

समझौते का टूटना और बढ़ता तनाव

ईरान न्यूक्लियर डील 10 साल के लिए थी, लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया। ट्रंप का तर्क था कि ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम को रोकने में विफल रहा है। इसके बाद ईरान ने भी परमाणु पाबंदियों को मानना बंद कर दिया। जो बाइडेन के कार्यकाल में भी समझौते को पटरी पर लाने की कोशिशें विफल रहीं और अक्टूबर 2023 में हमास के इजराइल पर हमले ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। ईरान गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर इजराइल और अमेरिका के खिलाफ मजबूती से खड़ा हो गया।

2026 का युद्ध और शांति समझौता

2024 में ट्रंप की वापसी के बाद अमेरिका का रुख और कड़ा हो गया। ट्रंप ने खामेनेई को परमाणु कार्यक्रम बंद करने की सीधी चेतावनी दी और जून 2025 में बातचीत की कोशिशों के बीच ईरान पर हमला हुआ। अंततः 28 फरवरी 2026 की रात अमेरिका और इजराइल ने एक बड़े ऑपरेशन में सुप्रीम लीडर अली खामनेई को निशाना बनाया, जिससे भीषण युद्ध छिड़ गया। वैश्विक शक्तियों के हस्तक्षेप के बाद 17 जून 2026 को फ्रांस में ट्रंप और पेजेश्कियन ने डील पर साइन किए। इस समझौते में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। अब देखना यह है कि यह समझौता कितनी जल्दी धरातल पर उतर पाता है।

विज्ञापन