पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच आयोजित की गई उच्च स्तरीय शांति वार्ता किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे बिना समाप्त हो गई है। लगभग 21 घंटे तक चली इस मैराथन बैठक का मुख्य उद्देश्य पिछले दो हफ्तों से जारी नाजुक युद्धविराम को एक स्थायी समझौते में बदलना था। अधिकारियों के अनुसार, यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी और सीधी बातचीत मानी जा रही थी। इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई, लेकिन लंबी चर्चा के बावजूद दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहे।
परमाणु संवर्धन और यूरेनियम पर गहरा मतभेद
वार्ता के दौरान सबसे बड़ा गतिरोध ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रहा। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने स्पष्ट मांग रखी कि ईरान को अपना यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पूरी तरह से बंद करना होगा और यह गारंटी देनी होगी कि वह भविष्य में परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि बातचीत आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि ईरान इन शर्तों को मानने के लिए तैयार नहीं था। दूसरी ओर, ईरान के वार्ताकारों ने इन मांगों को अनुचित बताया। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण उद्देश्यों और ऊर्जा जरूरतों के लिए है। ईरान ने अमेरिका पर अत्यधिक मांगें थोपने का आरोप लगाया, जिससे वार्ता की मेज पर सहमति की संभावनाएं क्षीण हो गई।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और वैश्विक तेल आपूर्ति का संकट
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण और सुरक्षा का मुद्दा भी इस 21 घंटे की बैठक में छाया रहा। अमेरिका ने मांग की कि ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को तुरंत और पूरी तरह से व्यापारिक जहाजों के लिए खोल दे ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति सामान्य हो सके। इसके विपरीत, ईरान ने शर्त रखी कि वह होर्मुज पर अपना नियंत्रण तभी कम करेगा जब उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएंगे और उसे सुरक्षा की ठोस गारंटी दी जाएगी। ईरान इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपना नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं दिखा, जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानता है। इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच कोई साझा जमीन नहीं मिल सकी, जिससे समुद्री सुरक्षा पर अनिश्चितता बरकरार है।
लेबनान में सैन्य कार्रवाई और हिज्बुल्लाह का मुद्दा
क्षेत्रीय संघर्ष, विशेष रूप से लेबनान में जारी सैन्य कार्रवाइयों ने वार्ता के माहौल को और जटिल बना दिया। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा लेबनान में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर हमले जारी रखने के फैसले ने ईरान को नाराज कर दिया। ईरान ने मांग की कि अमेरिका इजराइल पर दबाव बनाकर इन हमलों को रुकवाए। हालांकि, अमेरिकी पक्ष ने इसे एक अलग सुरक्षा मुद्दा बताया और इसे सीधे तौर पर द्विपक्षीय वार्ता से जोड़ने से इनकार कर दिया। ईरान का तर्क था कि जब तक उसके क्षेत्रीय सहयोगियों पर हमले जारी रहेंगे, तब तक किसी भी शांति समझौते का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनियां और कूटनीतिक दबाव
इस्लामाबाद में चल रही इस वार्ता के दौरान अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ट्रंप ने सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से ईरान को लगातार चेतावनी दी कि यदि वह समझौते की शर्तों को स्वीकार नहीं करता है, तो भविष्य में उस पर सैन्य और आर्थिक दबाव और अधिक बढ़ाया जाएगा। ईरान के अधिकारियों के अनुसार, इन चेतावनियों ने बातचीत के माहौल को तनावपूर्ण बना दिया और ईरान को लगा कि अमेरिका कूटनीति के बजाय दबाव की रणनीति अपना रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास और गहरा गया।
ऐतिहासिक अविश्वास और वार्ता की विफलता के कारण
21 घंटे की इस लंबी कवायद के बाद भी किसी समझौते तक न पहुंच पाने का सबसे बड़ा कारण दशकों पुराना अविश्वास रहा। 1979 के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में जो कड़वाहट रही है, वह इस बैठक में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी। ईरान को अमेरिका की हर पेशकश में कोई न कोई साजिश नजर आई, जबकि अमेरिका को ईरान की परमाणु और क्षेत्रीय प्रतिबद्धताओं पर भरोसा नहीं था। पाकिस्तान द्वारा की गई मध्यस्थता के बावजूद, दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल अपने बुनियादी सिद्धांतों से पीछे हटने को तैयार नहीं थे और फिलहाल, इस वार्ता के विफल होने से मध्य पूर्व में शांति की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है और क्षेत्र में तनाव कम होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।