अमेरिका वर्तमान में ईरान के साथ परमाणु समझौते को किसी भी तरह से अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहा है ताकि वह युद्ध की स्थिति से बाहर निकल सके और अमेरिकी खुफिया एजेंसी की हालिया रिपोर्टों ने अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है, जिसमें उसकी स्थिति को प्रतिकूल दिखाया गया है। युद्ध के लंबे खिंचने के कारण अमेरिका के पास हथियारों की भारी कमी हो गई है, जिसके चलते उसे अपनी रणनीतियों में बदलाव करना पड़ा है।
शर्तों में बदलाव और सियासी सरेंडर के आरोप
ईरान से समझौते के लिए अमेरिका ने अपनी कई प्रमुख शर्तों में ढील दी है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ईरान पर यूरेनियम संवर्धन की पाबंदी को केवल 10 साल तक सीमित करना है। अमेरिका के राजनीतिक हलकों में इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ईरान के सामने 'सरेंडर' माना जा रहा है और हाल ही में एक अमेरिकी पत्रकार ने रक्षा मंत्री हेगसेथ के सामने इस पूरी स्थिति को क्रॉनोलॉजी के साथ पेश किया। गौरतलब है कि युद्ध की शुरुआत में ट्रंप ने ईरान में तख्तापलट की घोषणा की थी, लेकिन अब वे अपनी उस बात से पूरी तरह पलट गए हैं और ट्रंप ने पहले अपनी शर्तों पर समझौते की बात कही थी, लेकिन अब वे ईरान की शर्तों पर राजी होते दिख रहे हैं। ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि ईरान को उनका प्रस्ताव पसंद है, लेकिन वहां की सरकार के बदलते रुख के कारण स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
खुफिया रिपोर्ट और सैन्य ठिकानों का भारी नुकसान
वाशिंगटन पोस्ट ने सीआईए के हवाले से बताया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर अमेरिकी नाकाबंदी का ईरान पर तत्काल कोई बड़ा असर नहीं होगा और वह इसे अगले 9 महीनों तक आसानी से झेल सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास अभी भी 70 प्रतिशत हथियार सुरक्षित हैं, जो उसकी मजबूत स्थिति को दर्शाते हैं। वहीं, व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार, ईरान ने कतर, यूएई, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन और सऊदी अरब में स्थित अमेरिका के कम से कम 228 सैन्य ठिकानों को ध्वस्त कर दिया है। इन ठिकानों की मरम्मत में लगभग 5 बिलियन डॉलर का खर्च आने का अनुमान है।
हथियारों का संकट और वैश्विक चुनौतियां
फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका के 40 प्रतिशत हथियार खत्म हो चुके हैं। टॉमहॉक मिसाइलों की संख्या 3,000 से घटकर 1,600 रह गई है, यानी 1,400 मिसाइलें इस्तेमाल हो चुकी हैं। इसी तरह, PRS मिसाइलें 90 से घटकर केवल 20 बची हैं। एयर डिफेंस सिस्टम में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इन हथियारों की भरपाई करने में अमेरिका को कम से कम 47 महीने का समय लग सकता है, जिसे उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एक बैठक में गंभीर मुद्दा बताया था। इसके अलावा, साउथ चाइना सी में चीन का बढ़ता दबदबा भी एक बड़ी चुनौती है। ताइवान, फिलिपींस, जापान और इंडोनेशिया जैसे करीबी देशों के पास चीन की सक्रियता बढ़ रही है। ट्रंप इस महीने के मध्य में चीन का दौरा कर सकते हैं, लेकिन ईरान के साथ युद्ध को रोके बिना यह यात्रा उनके लिए सुरक्षित नहीं मानी जा रही है।
अमेरिकी प्रशासन के लिए वर्तमान में सबसे बड़ी चुनौती अपने घटते सैन्य संसाधनों और वैश्विक रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाना है। राष्ट्रपति ट्रंप के लिए चीन का प्रस्तावित दौरा और साउथ चाइना सी की स्थिति ईरान के साथ जल्द से जल्द समझौता करने के मुख्य कारणों में से एक है।