मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है क्योंकि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में नए सिरे से छिड़े विवाद के बाद, अमेरिकी सेना ने पिछले 48 घंटों के भीतर ईरान पर 170 हमले किए हैं। इस अचानक हुई सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक स्तर पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि इस बार दोनों देशों के बीच यह लड़ाई कितने दिनों तक चलेगी। आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका ने मंगलवार को 80 हमले किए और बुधवार को हमलों की संख्या बढ़कर 90 हो गई, जो संघर्ष की गंभीरता को दर्शाता है।
राष्ट्रपति ट्रंप का कड़ा रुख और समझौतों का अंत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सैन्य हस्तक्षेप को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। ट्रंप ने अपने एक सार्वजनिक बयान में ईरान के नेतृत्व पर तीखा हमला करते हुए कहा कि ईरान के लोग झूठे हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि उन्होंने ईरान के साथ किए गए समझौतों को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। ट्रंप के मुताबिक, इन हमलों का मुख्य उद्देश्य ईरान को एक गैर-परमाणु मुल्क बनाना है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक ईरान अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को पूरी तरह नहीं छोड़ देता, तब तक अमेरिका अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगा। ट्रंप का मानना है कि ईरान को सबक सिखाना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी हो गया है।
युद्ध के इतिहास और संभावित अवधि का विश्लेषण
वर्तमान हमलों के बीच विशेषज्ञ इस बात का आकलन कर रहे हैं कि यह युद्ध कितना लंबा खिंच सकता है। अगर पिछले संघर्षों पर नजर डालें तो युद्ध की अवधि अलग-अलग रही है। साल 2025 में ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध केवल 12 दिनों तक चला था। वहीं, इसी साल फरवरी में जब अमेरिका ने ईरान पर हमला किया था, तब दोनों देशों के बीच करीब 39 दिनों तक भीषण युद्ध चला था। ये ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि युद्ध की अवधि रणनीतिक लक्ष्यों और दोनों देशों की जवाबी कार्रवाई पर निर्भर करती है। इस बार भी अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या यह संघर्ष हफ्तों तक चलेगा या कुछ ही दिनों में सिमट जाएगा।
युद्ध की अवधि तय करने वाले दो प्रमुख कारक
विशेषज्ञों का मानना है कि यह जंग कितने दिनों तक चलेगी, यह मुख्य रूप से दो कारकों पर निर्भर करेगा। पहला कारक अमेरिका की तैयारी है। अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सियोस से बातचीत में व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका हर स्थिति के लिए तैयार है। अधिकारियों का कहना है कि यह जंग 1 दिन, 2 दिन या 1 महीना तक भी चल सकती है। अमेरिका का मुख्य उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय यातायात के लिए पूरी तरह से सुरक्षित खोलना है और जब तक यह लक्ष्य हासिल नहीं होता, हमले जारी रहेंगे। रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ईरान की वादाखिलाफी से बेहद नाराज हैं और उन्हें लगता है कि ईरान को सबक सिखाना अनिवार्य हो गया है।
ईरान की सैन्य शक्ति और हथियारों का जखीरा
दूसरा महत्वपूर्ण कारक ईरान की सैन्य क्षमता है। फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसी (FDD) की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस जंग की शुरुआत से पहले ईरान के पास लगभग 3000 बैलिस्टिक मिसाइलें थीं। हालांकि, युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर मिसाइलों के इस्तेमाल के बाद अब यह संख्या घटकर लगभग 1500 रह गई है। ईरान ने इस संघर्ष के दौरान इजराइल, यूएई और कुवैत पर करीब 1500 मिसाइलें दागी हैं। मिसाइलों के अलावा, ईरान के पास ड्रोन का एक विशाल जखीरा मौजूद है। शाहेद ड्रोन को ईरान का सबसे खतरनाक हथियार माना जाता है, जिसने युद्ध के मैदान में अपनी प्रभावशीलता साबित की है। अनुमान है कि ईरान के पास 30000 से ज्यादा ड्रोन मौजूद हैं।
ईरान की रक्षात्मक रणनीति और रिकवरी
वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में ईरान की रक्षात्मक तैयारियों का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने अपनी भूमिगत सुरंगों के नेटवर्क को काफी मजबूत कर लिया है, जिससे उसके सैन्य ठिकानों को नष्ट करना मुश्किल हो गया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान ने जंग में बर्बाद हुए अपने 50 प्रतिशत से ज्यादा हथियारों को वापस पा लिया है या उन्हें फिर से तैयार कर लिया है। इसका मतलब है कि ईरान इस युद्ध को लंबा खींचने की क्षमता रखता है और अमेरिकी दबाव के बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं है। उसकी रिकवरी क्षमता अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
विवाद की मुख्य वजह: होर्मुज समझौते का उल्लंघन
अमेरिका और ईरान के बीच इस ताजा जंग की नौबत एक समझौते के टूटने के कारण आई है। एक पिछले समझौते के तहत ईरान ने यह वादा किया था कि वह अगले 60 दिनों तक होर्मुज से गुजरने वाले किसी भी जहाज पर हमला नहीं करेगा। लेकिन इस हफ्ते की शुरुआत में ईरान ने इस वादे को तोड़ दिया। ईरानी सेना ने पहले सऊदी अरब के तेल टैंकर को निशाना बनाया और उसके बाद कतर के तेल टैंकर पर हमला किया। ये हमले ओमान के तट के करीब हुए, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हुई। राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे गंभीर वादाखिलाफी माना है और उनका मानना है कि अगर ईरान को अभी नहीं रोका गया, तो वह भविष्य में किसी भी अंतरराष्ट्रीय शर्त को नहीं मानेगा।