नाटो (NATO) को लेकर अमेरिका का रुख अब और अधिक सख्त होता जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने नाटो सहयोगियों में से 'अच्छे' और 'बुरे' देशों की एक सूची तैयार की है। इस सूची को तैयार करने का मुख्य उद्देश्य उन देशों पर दबाव बनाना है, जिन्होंने ईरान के खिलाफ युद्ध की स्थिति में अमेरिका का साथ नहीं दिया। यह योजना नाटो महासचिव मार्क रुटे के हालिया अमेरिका दौरे से ठीक पहले तैयार की गई थी।
सहयोग के आधार पर देशों का वर्गीकरण
द पॉलिटिको की एक रिपोर्ट के अनुसार, नाटो के सदस्य देशों को उनके योगदान और अमेरिकी हितों के प्रति उनके समर्थन के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है। हालांकि, अभी तक यह आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है कि किस देश को किस विशिष्ट श्रेणी में रखा गया है और उनके खिलाफ क्या दंडात्मक कदम उठाए जाएंगे। यह घटनाक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नाटो देशों को दी गई अपनी पिछली धमकियों को अमली जामा पहनाने की योजना पर काम कर रहे हैं।
आदर्श सहयोगी और संभावित लाभ
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जो देश नाटो के लिए अपना रक्षा खर्च बढ़ाते हैं और अमेरिका का सक्रिय समर्थन करते हैं, उन्हें 'आदर्श सहयोगी' माना जाएगा। ऐसे देशों को अमेरिका की ओर से अधिक सैन्य सहायता, सुरक्षा गारंटी और अन्य रणनीतिक लाभ मिल सकते हैं।
चेक रिपब्लिक और अल्बानिया ने ईरान पर हमले के संदर्भ में अमेरिका का समर्थन किया है, जिससे उनकी स्थिति मजबूत हुई है।
असहयोग करने वाले देशों पर कार्रवाई की चेतावनी
दूसरी ओर, जो देश अमेरिका के निर्देशों का पालन नहीं करते या सैन्य सहयोग में पीछे रहते हैं, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। इन कदमों में संबंधित देशों से अमेरिकी सैनिकों की संख्या में कटौती करना, संयुक्त सैन्य अभ्यासों को कम करना या हथियारों की आपूर्ति पर रोक लगाना शामिल हो सकता है। ईरान युद्ध इस पूरी योजना के पीछे एक बड़ा कारण बनकर उभरा है। जिन देशों ने अमेरिका को अपने सैन्य ठिकाने इस्तेमाल करने की अनुमति दी, उन्हें 'अच्छे सहयोगी' के रूप में देखा जा रहा है।
विभिन्न देशों का रुख और वर्तमान स्थिति
ईरान के मामले में विभिन्न नाटो देशों का रुख अलग-अलग रहा है, जिसका विवरण इस प्रकार है:
पोलैंड और रोमानिया को इस नई नीति से सबसे अधिक लाभ होने की उम्मीद है। पोलैंड में वर्तमान में लगभग 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और वहां की सरकार इन सैनिकों पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा स्वयं वहन करती है।
योजना की आलोचना और भविष्य की आशंकाएं
अमेरिका की इस 'इनाम और सजा' वाली नीति की व्यापक आलोचना भी हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नाटो जैसे विशाल सैन्य गठबंधन में इस तरह का भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने से गठबंधन की एकता कमजोर हो सकती है। अमेरिकी सीनेटर रोजर विकर ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सहयोगियों के बारे में इस तरह से बात करना उचित नहीं है, क्योंकि इससे द्विपक्षीय रिश्तों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। यदि यह योजना पूर्ण रूप से लागू होती है, तो यूरोप और अमेरिका के बीच पहले से मौजूद मतभेद और गहरे हो सकते हैं।