19 साल बाद पार्टी के साथ चुनाव मैदान में उतरेंगे व्लादिमीर पुतिन, जानें वजह

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19 साल बाद पार्टी के साथ चुनाव मैदान में उतरेंगे व्लादिमीर पुतिन, जानें वजह
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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक बड़ा राजनीतिक निर्णय लेते हुए 19 साल बाद अपनी पार्टी के साथ सीधे तौर पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध को 3 साल से अधिक का समय बीत चुका है और इसके परिणाम अब रूस के आंतरिक हिस्सों में भी महसूस किए जा रहे हैं। यूक्रेन द्वारा किए जा रहे लगातार ड्रोन हमलों ने न केवल सीमावर्ती इलाकों बल्कि मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग जैसे प्रमुख शहरों को भी अपनी जद में ले लिया है, जिससे आम नागरिकों के बीच सुरक्षा को लेकर चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।

रूस के भीतर गहराता संकट और जन आक्रोश

यूक्रेन के ड्रोन हमलों के कारण रूस के कई हिस्सों में ईंधन की भारी कमी और इंटरनेट ब्लैकआउट जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो गई हैं। इन बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने आम जनता की नाराजगी को और अधिक हवा दी है। राष्ट्रपति पुतिन ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि इन हमलों ने देश के भीतर कई तरह की परेशानियां खड़ी कर दी हैं और इसके बावजूद, उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे युद्ध को समाप्त करने के लिए अपनी पूर्व निर्धारित शर्तों से किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेंगे। पुतिन का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि वे आंतरिक दबाव के बावजूद सैन्य अभियान को जारी रखने के पक्ष में हैं।

यूनाइटेड रशिया पार्टी की गिरती लोकप्रियता और चुनावी रणनीति

सितंबर में होने वाले संसदीय चुनावों को देखते हुए क्रेमलिन के सामने जनता के गुस्से को शांत करने की एक बड़ी चुनौती है। वर्तमान में, लोगों का गुस्सा सीधे तौर पर पुतिन के बजाय सत्ताधारी यूनाइटेड रशिया पार्टी पर अधिक दिखाई दे रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी की समर्थन रेटिंग गिरकर लगभग 30 प्रतिशत के आसपास रह गई है। अपनी खोई हुई लोकप्रियता को वापस पाने के लिए पार्टी ने अब खुद को पूरी तरह से राष्ट्रपति पुतिन के नाम और चेहरे के साथ जोड़ना शुरू कर दिया है। 2007 के बाद यह पहला मौका है जब पार्टी ने खुद को आधिकारिक तौर पर 'राष्ट्रपति की पार्टी' के रूप में पेश किया है। पार्टी की बैठकों में 'पुतिन के साथ होना ही न्यूनतम जिम्मेदारी है' जैसे नारों का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि मतदाताओं को फिर से आकर्षित किया जा सके।

पुतिन पर घटता भरोसा और सर्वे के आंकड़े

हालांकि पार्टी पुतिन के नाम का सहारा ले रही है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि खुद राष्ट्रपति के प्रति भी जनता का भरोसा पहले जैसा नहीं रहा है और क्रेमलिन से जुड़े सर्वे संस्थान एफओएम के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पुतिन पर जनता का भरोसा घटकर 69 प्रतिशत पर आ गया है। गौर करने वाली बात यह है कि 2022 में युद्ध की शुरुआत के बाद से यह पुतिन की लोकप्रियता का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि युद्ध के लंबे खिंचने और उससे उत्पन्न होने वाली रोजमर्रा की दिक्कतों ने रूसी समाज के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया है।

सीजफायर के प्रस्तावों को ठुकराने की वजह

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन ने कई मौकों पर सीमित युद्धविराम या सीजफायर के प्रस्ताव दिए थे ताकि लंबी दूरी के ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोका जा सके। लेकिन राष्ट्रपति पुतिन ने इन सभी प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया है। पुतिन का मानना है कि किसी भी प्रकार का समझौता रूस की कमजोरी के रूप में देखा जाएगा और इससे युद्ध के मैदान में रूस की स्थिति कमजोर हो सकती है। वे किसी भी कीमत पर अपनी बढ़त बनाए रखना चाहते हैं, यही कारण है कि फिलहाल शांति की कोई भी संभावना नजर नहीं आ रही है।

भविष्य की चुनौतियां और सरकार की मुश्किलें

रूस में इंटरनेट सेवाओं का बाधित होना और ईंधन संकट जैसी समस्याओं ने लोगों के जीवन को कठिन बना दिया है। हालांकि, रूस में सरकार के खिलाफ खुलकर बोलना या विरोध प्रदर्शन करना आसान नहीं है क्योंकि वहां असहमति जताने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाती है और इसके बावजूद, दबी हुई नाराजगी भविष्य में एक बड़ी चुनौती बन सकती है। जानकारों का कहना है कि यदि युद्ध इसी तरह लंबा चलता रहा और आम लोगों की बुनियादी जरूरतें प्रभावित होती रहीं, तो आने वाले समय में क्रेमलिन के लिए घरेलू मोर्चे पर हालात को संभालना बेहद मुश्किल हो सकता है।

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