भारत में शादी-ब्याह का सीजन हो या दिवाली और धनतेरस जैसे बड़े त्योहार, सोने की खरीदारी को भारतीय संस्कृति में बेहद शुभ और निवेश का सबसे सुरक्षित जरिया माना जाता है। लेकिन एक कड़वा सच यह है कि जो सोना भारत में ऊंचे दामों पर मिलता है, वही दुबई, अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों में काफी सस्ता उपलब्ध है। आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में करीब 18 प्रतिशत तक महंगा है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत में 10 ग्राम सोना खरीदने के लिए आप जितनी रकम खर्च करते हैं, उतने में विदेशों में कहीं अधिक सोना मिल सकता है। आम लोगों और निवेशकों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि आखिर भारत में सोने की कीमतें इतनी अधिक क्यों हैं और इसके पीछे कौन से बड़े आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं।
आंकड़ों के जरिए कीमतों का गणित
अगर हम साल 2026 के शुरुआती आंकड़ों को देखें, तो कीमतों का अंतर साफ नजर आता है। 1 जनवरी 2026 को भारत में 24 कैरेट सोने का भाव 132614 रुपये प्रति 10 ग्राम था। लेकिन महज पांच महीनों के भीतर, मई 2026 तक इसमें 23615 रुपये की भारी उछाल देखी गई और यह 156229 रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसके विपरीत, अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार की बात करें, तो वहां सोने की कीमत 4319 डॉलर प्रति औंस से बढ़कर केवल 4388 डॉलर प्रति औंस तक ही पहुंची। इसका मतलब यह है कि वैश्विक बाजार में सोने की कीमतों में सिर्फ 1 दशमलव 6 प्रतिशत का मामूली इजाफा हुआ है, जबकि भारत में यह बढ़ोतरी 18 प्रतिशत के आसपास रही है।
आयात शुल्क और टैक्स का बड़ा बोझ
भारत में सोना महंगा होने की सबसे बड़ी और मुख्य वजह टैक्स का ढांचा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 90 प्रतिशत सोना विदेशों से आयात करता है। जब सरकार बाहर से सोना मंगाती है, तो उस पर भारी आयात शुल्क यानी इंपोर्ट ड्यूटी लगाई जाती है ताकि देश के विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखा जा सके और हाल के समय में सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी की है। इसके साथ ही, सोने पर एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट सेस भी लगाया जाता है और इन सबके ऊपर 3 प्रतिशत जीएसटी भी वसूला जाता है। जब यह सोना ज्वेलर्स के शोरूम तक पहुंचता है, तो इसमें मेकिंग चार्ज भी जुड़ जाता है। इन सभी टैक्स और शुल्कों की वजह से भारत में सोना खरीदते समय ग्राहकों को करीब 18 प्रतिशत तक अतिरिक्त कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि दुबई और सिंगापुर जैसे देशों में टैक्स बहुत कम होने के कारण सोना सस्ता मिलता है।
रुपये की कमजोरी और डॉलर का प्रभाव
सोने की कीमतों में बढ़ोतरी की दूसरी बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का कमजोर होना है और वैश्विक स्तर पर सोने का व्यापार अमेरिकी डॉलर में किया जाता है। पिछले कुछ समय में रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरी है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत स्थिर भी रहे, तब भी भारत को उसे खरीदने के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं क्योंकि आयातकों को भुगतान डॉलर में करना होता है। यही बढ़ी हुई लागत सीधे तौर पर भारतीय बाजार में सोने के भाव को बढ़ा देती है, जिससे आम उपभोक्ता की जेब पर बोझ पड़ता है।
आम आदमी और निवेशकों पर असर
मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए सोने की ये बढ़ी हुई कीमतें बड़ी चुनौती पेश करती हैं, खासकर शादी-ब्याह के समय जब भारी मात्रा में जेवर बनवाने होते हैं और 18 प्रतिशत ज्यादा दाम और ऊपर से ज्वेलर्स के 10 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक के मेकिंग चार्जेस बजट को काफी बिगाड़ देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में समझदारी इसी में है कि जरूरत के हिसाब से ही खरीदारी की जाए। लोग भारी डिजाइन के बजाय हल्की डिजाइन के गहने चुन सकते हैं या 22 कैरेट की जगह 18 कैरेट ज्वेलरी पर विचार कर सकते हैं। वहीं निवेशकों के लिए यह एक अच्छा मौका भी हो सकता है क्योंकि वैश्विक अनिश्चितता के दौर में सोने को एक सुरक्षित निवेश माना जाता है और इसने लंबे समय में हमेशा बेहतर रिटर्न दिया है।