शी जिनपिंग का मिस्र दौरा: मिडिल ईस्ट जंग के बीच सऊदी और यूएई को क्यों छोड़ा?

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शी जिनपिंग का मिस्र दौरा: मिडिल ईस्ट जंग के बीच सऊदी और यूएई को क्यों छोड़ा?
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मिडिल ईस्ट में जारी भीषण जंग और बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग मिस्र के दौरे पर पहुंचे हैं। इस यात्रा ने वैश्विक कूटनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब चीन के सऊदी अरब और यूएई जैसे खाड़ी देशों के साथ बेहद मजबूत और पुराने रिश्ते हैं, तो शी जिनपिंग ने इस नाजुक वक्त में मिस्र को ही क्यों चुना? दरअसल, मिस्र की भौगोलिक स्थिति और उसकी वर्तमान विदेश नीति चीन के लिए उसे एक अनिवार्य साझेदार बनाती है। चीन इस क्षेत्र में खुद को एक ऐसी महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है जो सैन्य हस्तक्षेप के बजाय व्यापार और कूटनीति के माध्यम से शांति और स्थिरता लाने का पक्षधर है।

ईरान के साथ संबंधों का विशेष समीकरण

चीन के लिए मिस्र को चुनने का पहला और सबसे बड़ा कारण यह है कि मिस्र का ईरान के साथ कोई सीधा रणनीतिक या सैन्य टकराव नहीं है। सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों का ईरान के साथ पुराना और गहरा विवाद रहा है, जिससे चीन के लिए वहां संतुलन बनाना कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके विपरीत, काहिरा ईरान के खिलाफ खड़े देशों की कतार में प्रमुखता से शामिल नहीं है। ऐसे समय में जब ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच संघर्ष का असर पूरे इलाके पर पड़ रहा है, चीन के लिए एक ऐसे देश के साथ नजदीकी बढ़ाना रणनीतिक रूप से फायदेमंद है जो सभी पक्षों के साथ बातचीत का रास्ता खुला रख सकता है।

मिस्र का न्यूट्रल रुख और रणनीतिक स्वायत्तता

दूसरा महत्वपूर्ण कारण मिस्र का न्यूट्रल यानी तटस्थ रुख है। हालांकि मिस्र ऐतिहासिक रूप से अमेरिका का एक करीबी सहयोगी रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में उसने अपनी विदेश नीति में बड़े बदलाव किए हैं। काहिरा ने खुद को पूरी तरह से वॉशिंगटन के रणनीतिक खेमे में सीमित नहीं रखा है। मिस्र ने चीन और रूस जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को लगातार विस्तार दिया है। साल 2023 में मिस्र का ब्रिक्स (BRICS) समूह में शामिल होना और साल 2024 में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के साथ सहयोग के समझौतों पर हस्ताक्षर करना इस बात का प्रमाण है कि वह अपनी विदेश नीति में कई विकल्प खुले रखना चाहता है। चीन के लिए यह एक बड़ा अवसर है क्योंकि वह एक ऐसे देश के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है जिसकी पहुंच पश्चिम और अरब दुनिया दोनों तक है।

स्वेज नहर: व्यापार और सुरक्षा का मुख्य केंद्र

तीसरा और सबसे निर्णायक कारण स्वेज नहर है। मिस्र के पास मौजूद यह नहर एशिया और यूरोप के बीच व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है। मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही में आने वाली बाधाओं के बीच स्वेज नहर की रणनीतिक अहमियत कई गुना बढ़ गई है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक देश है और उसकी ऊर्जा जरूरतें पूरी तरह से समुद्री रास्तों पर निर्भर हैं। इसलिए बीजिंग के लिए उस देश के साथ प्रगाढ़ संबंध रखना अनिवार्य है जिसके नियंत्रण में यह वैश्विक व्यापारिक मार्ग है।

आर्थिक निवेश और भविष्य की राह

चीन ने मिस्र की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है। आंकड़ों के अनुसार, चीन अब तक मिस्र में 10 अरब डॉलर से भी ज्यादा का निवेश कर चुका है। शी जिनपिंग का यह दौरा केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि यह व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा के लिहाज से एक सोची-समझी चाल है। चीन खुद को मिडिल ईस्ट में एक ऐसे ताकतवर देश के तौर पर पेश कर रहा है जो बुनियादी ढांचे और विकास के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। मिस्र इस भूमिका में चीन का सबसे उपयोगी पार्टनर साबित हो सकता है क्योंकि वह अरब दुनिया और अफ्रीका दोनों के लिए एक प्रवेश द्वार की तरह है। यही कारण है कि मिडिल ईस्ट के बदलते समीकरणों में शी जिनपिंग ने इस बार काहिरा को विशेष प्राथमिकता दी है।

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