नई दिल्ली / अयोध्या विवाद: बहस खत्म, अब फैसले का इंतजार, जानें सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या-क्या हुआ

Live Hindustan : Oct 17, 2019, 07:15 AM

नई दिल्ली | अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद मामले में 40 दिन तक लगातार दलीलें सुनने के बाद उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को शाम चार बजे अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील इस मुद्दे पर 17 नवंबर से पहले फैसला आना तय है, क्योंकि 17 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इससे पहले उन्हें फैसला देना आवश्यक है। ब्रिटिश काल से चल रहा अयोध्या का केस : सर्वोच्च अदालत का फैसला आने के बाद 160 साल से भी ज्यादा पुराने समय से चल रहे इस ऐतिहासिक मुकदमे का समाधान हो जाने की उम्मीद है। पहली बार यह मामला ब्रिटिश काल में फैजाबाद के तत्कालीन कमिश्नर के सामने में 1855 में आया था। 

पक्षकार तीन दिन में लिखित बहस दे सकेंगे:मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जज की संविधान पीठ ने इसके साथ ही सभी पक्षों से कहा कि वे र्मोंल्डग ऑफ रिलीफ (किए गए आवेदनों में  बदलाव) के बारे में अपनी लिखित बहस तीन दिन के अंदर अदालत को दे दें। पहले कोर्ट ने इसके लिए एक दिन का समय रखा था लेकिन बाद में सुनवाई को एक दिन कम कर दिया।

लगातार सुनवाई : संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड, अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर शामिल हैं। पीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर छह अगस्त से रोजाना सुनवाई कर रही थी। इस दौरान रामलला विराजमान, जन्मस्थान पुनरुद्धार समिति, हिन्दू महासभा, निर्मोही अखाड़ा, यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड, हाजी महबूब और हाजी अंसारी तथा यूपी शिया वक्फ बोर्ड समेत सभी पक्षकारों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं।

और समय देने से इनकार : बुधवार की सुबह सुनवाई शुरू होने पर पीठ ने स्पष्ट कर दिया था कि वह पिछले 39 दिनों से अयोध्या भूमि विवाद में दलीलें सुन रही है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि इस मामले में सुनवाई पूरी करने के लिए किसी भी पक्षकार को आज के बाद अब और समय नहीं दिया जाएगा। अदालत ने इसीलिए बुधवार को ही सभी पक्षों में समय का बंटवारा कर दिया था।

दोनों पक्षों से कई सवाल: सुनवाई के दौरान पीठ ने दोनों ही पक्षों से कई सवाल किए और दलीलों के समर्थन में साक्ष्य भी मांगे। वहीं, भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका को हटा दिया और कहा कि इसे बाद में सुना जाएगा। इससे पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा व रामलला विराजमान के बीच बांटने का आदेश दिया था। 

बड़ी दलील

हिंदू पक्ष: एएसआई को खुदाई के दौरान मंदिर का ढांचा मिला। पुराणों में भी जन्मस्थान का जिक्र किया गया है। 

मुस्लिम पक्ष: ढांचा तो मस्जिद का भी हो सकता है। जन्मस्थान का कोई सबूत नहीं। 1949 में यहां गुंबद के नीचे मूर्ति रखी गई।

बड़े साक्ष्य

हिंदू पक्ष : खुदाई के दौरान पत्थरों पर मगरमच्छ-कछुओं के चित्र मिले थे। मगरमच्छ और कछुओं का मुस्लिम संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है।

मुस्लिम पक्ष : एएसआई साबित नहीं कर पाया कि वहां मंदिर है जबकि मस्जिद के संबंध में ऐसे साक्ष्य हैं।

मुकदमे और भी

छह दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराने के मामले में कुल 49 एफआईआर दर्ज की गईं हैं। इनमें लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व मुख्यमंत्री कल्यार्ण ंसह समेत 49 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है। लखनऊ की विशेष अदालत में 33 लोगों के खिलाफ ट्रायल जारी है। 

हिन्दू पक्ष

मस्जिद में मंदिर के खंभों का इस्तेमाल

रामलला विराजमान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने कहा कि बाबर ने वहां स्थित भव्य मंदिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया था और मंदिर के खंभों आदि का ही उपयोग मस्जिद बनाने में किया गया। खंभों पर मूर्तियां इसका प्रमाण हैं।

1885 से ही जमीन पर हमारा कब्जा

निर्मोही और निर्वाणी अखाड़ा ने कहा कि1885 से ही इस संपत्ति पर उनका कब्जा है और मुस्लिम पक्ष ने ईमानदारी से इस तथ्य को स्वीकार किया है। 1934 से इस विवादित ढांचे में किसी भी मुस्लिम को प्रवेश की इजाजत नहीं थी।

मुस्लिम पक्ष

कोर्ट कह चुकी है कि वहां मंदिर का सबूत नहीं

वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि हिंदू पक्ष के पास यात्रियों की किताबों के अलावा जमीन पर मालिकाना हक का कोई सबूत नहीं। कभी मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई गई। 1886 में फैजाबाद की अदालत भी कह चुकी है कि विवादित जमीन पर हिन्दू मंदिर होने के कोई सबूत नहीं मिले।