होर्मुज संकट के बीच भारत पर फ्रांस का भरोसा, G7 सम्मेलन में मिला विशेष निमंत्रण

फ्रांस ने G7 शिखर सम्मेलन के लिए भारत को विशेष वरीयता दी है। प्रधानमंत्री मोदी होर्मुज स्ट्रेट और मध्य-पूर्व के मुद्दों पर चर्चा करेंगे। यह निमंत्रण दोनों देशों के बीच बढ़ते आपसी विश्वास और रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक है।

फ्रांस द्वारा आयोजित होने वाले आगामी G7 शिखर सम्मेलन में भारत को विशेष वरीयता और सम्मान दिया गया है, जो दोनों देशों के बीच अटूट विश्वास को दर्शाता है। होर्मुज स्ट्रेट और मध्य-पूर्व में जारी तनावपूर्ण स्थितियों के बीच, फ्रांस ने भारत की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण माना है। फ्रांस का मानना है कि ईरान और मध्य-पूर्व के अन्य जटिल मुद्दों पर चर्चा के दौरान भारत की भागीदारी समाधान की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण सत्रों में हिस्सा लेंगे और वैश्विक चुनौतियों पर भारत का दृष्टिकोण साझा करेंगे। फ्रांस का यह भरोसा ही है कि वह हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को साथ लेकर काम करता है।

होर्मुज स्ट्रेट और मध्य-पूर्व पर विशेष बैठक

ईरान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रूप से खोलने के उद्देश्य से फ्रांस ने एक विशेष पहल की है। इसके लिए फ्रांस ने मिस्र, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब जैसे महत्वपूर्ण देशों को आमंत्रित किया है। 16 जून को होने वाली इस महत्वपूर्ण बैठक में इन देशों के साथ-साथ भारत और अमेरिका भी शामिल होंगे। फ्रांस का यह कदम स्पष्ट करता है कि वह भारत पर पूरी तरह से भरोसा करता है। यह विशेष वरीयता इस बात का प्रमाण है कि फ्रांस भारत की सदस्यता का इंतजार किए बिना उसे G7 के अभिन्न अंग के रूप में देखता है। आमतौर पर G7 प्लस में आमंत्रित देशों को अंतिम दिन शामिल किया जाता है, लेकिन भारत के लिए यह विशेष अपवाद बनाया गया है।

शिखर सम्मेलन का विवरण और वैश्विक भागीदारी

यह शिखर सम्मेलन 15 से 17 जून तक फ्रांस के शहर एवियन-लेस-बेन्स में आयोजित किया जाएगा, जो जिनेवा झील के पार स्थित है। इस समिट में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेता एक साथ आएंगे, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ-साथ अन्य उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी शामिल होंगे। भारत की भागीदारी इस सम्मेलन में केवल एक अतिथि के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में देखी जा रही है। भारत वर्तमान में ब्रिक्स की अध्यक्षता भी कर रहा है, जिससे इसकी वैश्विक भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। G7 की शुरुआत फ्रांस की अगुवाई में 1975 में की गई थी और 2026 में इसका मुख्य एजेंडा शांति और आर्थिक सहयोग रखा गया है।

प्रधानमंत्री मोदी के प्रमुख कार्यक्रम और सत्र

प्रधानमंत्री मोदी सम्मेलन के दौरान कई अहम सत्रों में भाग लेंगे। वह सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु (मिनिमम एज फॉर सोशल मीडिया) वाले सत्र में अपने विचार रखेंगे। इसके साथ ही, वह मैक्रो इकोनॉमिक इम्बैलेंस (मैक्रो इकोनॉमिक इम्बैलेंस) से जुड़े सत्र में भी शामिल होंगे। यह पहली बार है जब स्वास्थ्य (हेल्थ) को G7 के मुख्य विषयों में शामिल किया गया है, और भारत इसमें सक्रिय भूमिका निभाएगा। सुरक्षा के मामलों में, वित्तीय अपराध (फाइनेंसियल क्राइम) और अवैध अप्रवासन (गैर कानूनी इमीग्रेशन) जैसे दो महत्वपूर्ण मुद्दों को भी चर्चा में शामिल किया गया है। इसके अलावा, रूस-यूक्रेन मुद्दे और मध्य-पूर्व के संकट पर भी G7 देशों के बीच विस्तृत चर्चा होगी, जिसमें भारत की भागीदारी अधिकांश मामलों में सुनिश्चित की गई है।

द्विपक्षीय वार्ता और भविष्य की योजनाएं

प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा में द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई देने के लिए भी कई कार्यक्रम निर्धारित हैं। 14 मई को प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच द्विपक्षीय बातचीत होगी, जिसमें दोनों नेता लंच पर भी साथ रहेंगे। इसके अलावा, प्रधानमंत्री पेरिस में एक टेक्नोलॉजी कॉन्फ्रेंस में भी शिरकत करेंगे। भारत और फ्रांस के बीच वर्ष 2026 को इनोवेशन ईयर (innovation year-2026) के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी एक बड़ा लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत 2030 तक 30000 भारतीय छात्रों को फ्रांस में दाखिला और वीजा प्रदान किया जाएगा। फ्रांस भारत के कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिए एक लॉन्चिंग पैड की तरह उभरा है।

दो देशों की यात्रा: फ्रांस और स्लोवाकिया

प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा फ्रांस और स्लोवाकिया की दो देशों की यात्रा का हिस्सा है और नीस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात के बाद, प्रधानमंत्री रविवार को स्लोवाकिया के लिए रवाना होंगे। वहां उनके स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको से मिलने की उम्मीद है और यह दौरा न केवल फ्रांस के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि यूरोपीय देशों के साथ भारत के बढ़ते सहयोग को भी नई दिशा प्रदान करेगा।