Ola Uber और डिलीवरी बॉय के लिए बदलेंगे नियम, मिलेगा सोशल सिक्योरिटी फंड का लाभ

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत अब ओला, उबर और डिलीवरी कंपनियों को अपने गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष में अनिवार्य रूप से अंशदान देना होगा।

भारत में गिग वर्कर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाले लाखों श्रमिकों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। सरकार अब उन नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है जिसके तहत ओला, उबर और विभिन्न डिलीवरी कंपनियों के कामगारों को सामाजिक सुरक्षा कोष का लाभ मिलेगा। सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के प्रावधानों के अनुसार, एग्रीगेटर कंपनियों के लिए इस कोष में अपना अंशदान देना अब अनिवार्य कर दिया गया है। वर्तमान में इस बात पर गहन मंथन चल रहा है कि कंपनियों से यह अंशदान उनके सालाना टर्नओवर के आधार पर लिया जाए या फिर कामगारों को किए जाने वाले कुल भुगतान के आधार पर तय किया जाए।

अंशदान तय करने के लिए दो विकल्पों पर विचार

श्रम और रोजगार मंत्रालय के सूत्रों और उद्योग विश्लेषकों के अनुसार, सामाजिक सुरक्षा अंशदान की गणना के लिए दो मुख्य मॉडलों पर चर्चा की जा रही है। पहला विकल्प यह है कि हर लेनदेन या कामगारों को किए जाने वाले भुगतान को मानक बनाया जाए। दूसरा विकल्प कंपनियों के कुल सालाना कारोबार यानी टर्नओवर को आधार बनाने का है। जानकारों का मानना है कि प्रति लेनदेन या भुगतान आधारित व्यवस्था उन व्यवसायों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है जहां लेनदेन की संख्या तो बहुत अधिक होती है लेकिन प्रत्येक लेनदेन की राशि कम होती है। विशेष रूप से कैब, ऑटो और बाइक जैसी राइड-हेलिंग सेवाओं पर इस व्यवस्था का वित्तीय बोझ अधिक पड़ने की संभावना है और अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बिजनेस मॉडल के कारण इन दोनों व्यवस्थाओं का प्रभाव भी अलग-अलग हो सकता है।

क्या है सामाजिक सुरक्षा कानून और पात्रता के नियम

सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत एग्रीगेटर कंपनियों के लिए गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों के सामाजिक सुरक्षा कोष में अंशदान देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। नियमों के मुताबिक, यदि कोई गिग वर्कर किसी एक एग्रीगेटर के साथ एक वित्त वर्ष में 90 दिन काम करता है, तो वह इस योजना का लाभ पाने का पात्र हो जाता है। इसके अलावा, यदि कोई कामगार कई अलग-अलग एग्रीगेटर कंपनियों के साथ मिलकर कुल 120 दिन काम करता है, तो भी उसे इस योजना के तहत लाभ दिया जाएगा। एग्रीगेटर कंपनियों को हर साल अपने सालाना अंशदान का सटीक आकलन करना होगा और उसे सरकारी कोष में जमा करना होगा। अब सरकार इसी गणना के लिए तकनीकी व्यवस्था को अंतिम रूप दे रही है।

टर्नओवर और भुगतान पर अंशदान की सीमा

इस संहिता की धारा 114(4) में स्पष्ट किया गया है कि एग्रीगेटर कंपनियों को अपने सालाना टर्नओवर का 1 से 2 प्रतिशत तक अंशदान देना होगा। हालांकि, इसमें एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी है कि यह अंशदान राशि गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को किए जाने वाले कुल भुगतान के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। मंत्रालय एक वैकल्पिक फॉर्मूले पर भी विचार कर रहा है जिसमें सीधे कामगारों को किए गए भुगतान के आधार पर 5 प्रतिशत तक अंशदान लिया जा सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि भुगतान आधारित यह व्यवस्था राइड-हेलिंग सेवाओं जैसे उच्च लेनदेन वाले व्यवसायों के लिए काफी महंगी साबित हो सकती है।

कंपनियों और कामगारों पर पड़ने वाला प्रभाव

सरकार की इस पहल का उद्देश्य गिग इकोनॉमी में लगे श्रमिकों को एक सुरक्षा कवच प्रदान करना है। ओला, उबर और जोमैटो जैसी कंपनियों के लिए यह नियम उनके परिचालन खर्च को प्रभावित कर सकते हैं। विशेष रूप से राइड-हेलिंग कंपनियों के लिए भुगतान आधारित मॉडल अधिक बोझिल हो सकता है क्योंकि वहां हर छोटी राइड पर अंशदान की गणना करनी होगी। सरकार इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित फॉर्मूला तैयार करने की कोशिश कर रही है ताकि कंपनियों पर अत्यधिक बोझ न पड़े और कामगारों को उनके हक की सामाजिक सुरक्षा भी मिल सके। आने वाले समय में यह तय होगा कि इस कोष का प्रबंधन और वितरण किस प्रकार किया जाएगा।