जीएसटी काउंसिल: टैक्स अधिकारियों की कमेटियों में बड़े बदलाव की तैयारी, जानें नया प्लान

जीएसटी लागू होने के 9 साल बाद, जीएसटी काउंसिल अपनी समितियों को छोटा और अधिक प्रभावी बनाने के लिए पुनर्गठन की तैयारी कर रही है, जिससे टैक्स सिस्टम और अधिक सरल और पारदर्शी हो सके।

माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने के 9 साल बीत जाने के बाद, अब जीएसटी काउंसिल अपने टैक्स अधिकारियों की समितियों के पुनर्गठन पर गंभीरता से विचार कर रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस कवायद का मुख्य उद्देश्य इनडायरेक्ट टैक्स सिस्टम के मैच्योर होने के साथ ही इसे अधिक सरल, सुव्यवस्थित और प्रभावी बनाना है। जैसे-जैसे जीएसटी सिस्टम स्थिरता के संकेत दे रहा है, वैसे-वैसे इसके प्रशासनिक ढांचे को और अधिक कुशल बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

तीन समेकित निकायों में बदलाव का प्रस्ताव

मौजूदा ढांचे को बदलकर इसे 3 मुख्य इंटीग्रेटिड बॉडीज में तब्दील करने का प्रस्ताव रखा गया है। इन निकायों में सचिवालय, कार्यान्वयन समिति और अधिकारियों की एक स्थायी समिति शामिल होगी। वर्तमान व्यवस्था की बात करें तो इसमें एक सचिवालय, एक कार्यान्वयन समिति, फिटमेंट और कानून समिति सहित 8 स्थायी समितियां और 18 क्षेत्रीय समूह कार्यरत हैं। इस भारी-भरकम ढांचे को छोटा करके कामकाज में तेजी लाने की योजना है। पिछले साल सरकार ने जीएसटी रेट्स में बड़े रिफॉर्म्स के ऐलान किए थे, जिसके बाद अब प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान दिया जा रहा है।

जीएसटी कार्यान्वयन समिति की भूमिका

अधिकारियों की समिति के विचाराधीन नए ढांचे के अनुसार, जीएसटी कार्यान्वयन समिति (जीआईसी) शीर्ष स्तर पर निर्णय लेने वाली संस्था बनी रहेगी। यह सचिवालय द्वारा भेजे गए महत्वपूर्ण मामलों पर विचार करेगी और परिषद द्वारा सौंपे गए विषयों पर निर्णय लेगी और जीआईसी की जिम्मेदारी होगी कि वह जरूरत के अनुसार महत्वपूर्ण मामलों को सचिव, केंद्रीय वित्त मंत्री या सीधे परिषद के पास भेजे। इसके अलावा, यह समिति प्रौद्योगिकी से जुड़ी शिकायतों का निपटारा करने का काम भी जारी रखेगी ताकि तकनीकी बाधाओं को दूर किया जा सके।

नई स्थाई समिति का कार्य और गठन

प्रस्तावित नई स्थायी समिति मुख्य रूप से तकनीकी कामकाज को संभालेगी। इसका काम प्रक्रियाओं को सरल बनाना और व्यापार तथा उद्योग जगत से प्राप्त होने वाले ज्ञापनों पर विचार करना होगा। इसके साथ ही यह समिति कानून, नियमों, अधिसूचनाओं और फॉर्म में संशोधन के प्रस्तावों की बारीकी से जांच करेगी। इस समिति की सदस्यता को लेकर एक विशेष नियम बनाया गया है, जिसके तहत प्रत्येक राज्य के आनुपातिक आकार के आधार पर सदस्यता तय की जाएगी। यह सदस्यता हर 2 साल में चक्रीय (रोटेशनल) आधार पर बदलेगी। किसी भी राज्य के पास इस समिति में स्थायी सीट नहीं होगी। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए समिति के समक्ष रखे जाने वाले एजेंडा को सभी राज्यों के साथ साझा किया जाएगा ताकि उनकी राय ली जा सके।

सुधारों के पीछे के मुख्य सिद्धांत

सूत्रों ने बताया कि यह प्रस्तावित संस्थागत सुधार मुख्य रूप से दो सिद्धांतों पर आधारित हैं। पहला सिद्धांत यह है कि किसी भी प्रस्ताव पर शुरू से ही राजनीतिक सहमति और जवाबदेही होनी चाहिए और इसका मतलब है कि प्रस्ताव केवल अधिकारियों के बीच तय होकर बाद में मुहर लगवाने के लिए नहीं आने चाहिए, बल्कि उनमें शुरू से ही राजनीतिक स्पष्टता होनी चाहिए। दूसरा आधार प्रस्तावों के संचालन में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। गौरतलब है कि जीएसटी ने उत्पाद शुल्क, सेवा कर और वैट जैसे कई स्थानीय करों तथा उपकरों को मिलाकर ‘एक राष्ट्र, एक कर’ की एकीकृत व्यवस्था का निर्माण किया था, और अब 9 साल बाद इसे और अधिक परिष्कृत किया जा रहा है।