भारत के एफटीए बनेंगे ग्लोबल मार्केट में गेम चेंजर 95 लाख करोड़ का एक्सपोर्ट लक्ष्य होगा पूरा

यस सिक्योरिटीज के अनुसार भारत के नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पीएलआई और चाइना प्लस वन रणनीति के साथ मिलकर 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेंगे।

भारत के हालिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव साबित हो सकते हैं और ब्रोकरेज फर्म यस सिक्योरिटीज का यह मानना है कि इन महत्वपूर्ण समझौतों, पीएलआई स्कीम और वैश्विक चाइना प्लस वन रणनीति के सहारे भारत वर्ष 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 95 लाख करोड़ रुपये के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट का लक्ष्य हासिल करने में सफल हो सकता है। ये नए समझौते न केवल व्यापारिक बाधाओं को कम करेंगे, बल्कि देश में मैन्युफैक्चरिंग, निर्यात और निजी निवेश को भी एक नई और तेज गति प्रदान करेंगे।

ग्लोबल सप्लाई चेन में बढ़ेगी भारत की हिस्सेदारी

इन एफटीए के माध्यम से ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भागीदारी काफी बढ़ने की उम्मीद है। यस सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के अनुसार, इन समझौतों से भारतीय उत्पादों को नए और बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक बेहतर पहुंच प्राप्त होगी और इससे उत्पादन और निर्यात दोनों में तेजी आने की संभावना है। विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग और मशीनरी जैसे क्षेत्रों को इन समझौतों से सबसे अधिक लाभ मिलने की उम्मीद जताई गई है और इसके साथ ही, देश में इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन के स्थानीयकरण पर जो निवेश हो रहा है, वह इस पूरी प्रक्रिया को और अधिक मजबूती प्रदान करेगा।

प्रमुख देशों के साथ रणनीतिक समझौते

भारत ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ऑस्ट्रेलिया और ईएफटीए देशों के साथ कई महत्वपूर्ण फ्री ट्रेड एग्रीमेंट सफलतापूर्वक संपन्न किए हैं। इसके अतिरिक्त, वर्तमान में ओमान, न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंगडम (यूके) और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ भी इसी तरह के समझौतों पर तेजी से काम चल रहा है और यस सिक्योरिटीज के विश्लेषण के अनुसार, ये समझौते केवल आयात और निर्यात शुल्क को कम करने तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये भारत को वैश्विक व्यापार नेटवर्क के साथ गहराई से जोड़ने की दिशा में एक बहुत बड़ा और रणनीतिक कदम हैं।

निजी निवेश और औद्योगिक विकास को सहारा

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि एफटीए भारत के रुके हुए प्राइवेट कैपेक्स साइकिल यानी निजी पूंजीगत व्यय चक्र को दोबारा गति दे सकते हैं और वर्तमान समय में कई प्रमुख उद्योगों में क्षमता उपयोग करीब 75 फीसदी के आसपास बना हुआ है, जिसके कारण कई कंपनियां अभी बड़े निवेश करने से बच रही हैं। यदि निर्यात पर आधारित मांग में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो इससे कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा और वे नई उत्पादन क्षमता के निर्माण में निवेश करने के लिए प्रेरित होंगी। इस निवेश से न केवल औद्योगिक विकास होगा, बल्कि देश में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

सेवा क्षेत्र में नए अवसरों का सृजन

भारत ने 2030 तक कुल 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का एक व्यापक लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य में सामान और सेवाओं दोनों का योगदान बराबर रहने का अनुमान लगाया गया है। यूके और यूरोपीय संघ जैसे विकसित बाजारों के साथ होने वाले समझौते भारत की आईटी सेवाओं, कंसल्टिंग, इंजीनियरिंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट और वित्तीय सेवाओं के लिए नए द्वार खोल सकते हैं। इससे भारत की तकनीकी विशेषज्ञता और कुशल कार्यबल की ताकत का वैश्विक स्तर पर बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा।

चुनौतियां और भविष्य की राह

हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि केवल अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अपनी आंतरिक चुनौतियों जैसे कि उच्च लॉजिस्टिक्स लागत, महंगी बिजली, जटिल नियामक प्रक्रियाओं और कम श्रम उत्पादकता जैसी समस्याओं से भी प्रभावी ढंग से निपटना होगा। यदि इन बुनियादी समस्याओं का समय पर समाधान नहीं किया गया, तो आयात में निर्यात की तुलना में अधिक तेजी से वृद्धि हो सकती है, जिससे व्यापार घाटा बढ़ने का जोखिम बना रहेगा और इसलिए, एफटीए का पूर्ण लाभ उठाने के लिए घरेलू स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है।