भारत बनेगा सेमीकंडक्टर का ग्लोबल किंग: नीति आयोग ने 2035 तक का मास्टरप्लान किया तैयार

नीति आयोग ने 2035 तक भारत को सेमीकंडक्टर क्षेत्र में वैश्विक लीडर बनाने का विजन पेश किया है। इस योजना के तहत 150 अरब डॉलर की वैल्यू चेन बनाने और विदेशी चिप पर निर्भरता खत्म करने के लिए भारी निवेश की सिफारिश की गई है।

भारत सेमीकंडक्टर उद्योग का नया ग्लोबल किंग बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। नीति आयोग ने साल 2035 तक देश को चिप निर्माण के क्षेत्र में एक वैश्विक महाशक्ति में बदलने के लिए एक व्यापक विजन पेश किया है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य विदेशी चिप्स पर भारत की निर्भरता को पूरी तरह से समाप्त करना और 150 अरब डॉलर की एक मजबूत वैल्यू चेन स्थापित करना है। इसके लिए अगले एक दशक में 180 अरब डॉलर तक के भारी निवेश की आवश्यकता होगी, जिसमें सरकार को कुल खर्च का एक-तिहाई हिस्सा खुद वहन करने की सिफारिश की गई है। आजकल हमारे हाथ में मौजूद स्मार्टफोन से लेकर सड़क पर दौड़ती स्मार्ट कार तक, सब कुछ एक छोटी सी चिप यानी सेमीकंडक्टर पर निर्भर है। नीति आयोग की एक नई रिपोर्ट में इस बात का पूरा खाका खींचा गया है कि कैसे भारत साल 2035 तक दुनिया का नया सेमीकंडक्टर किंग बन सकता है।

2035 तक बदलेगी तस्वीर और 150 अरब डॉलर का मास्टरप्लान

नीति आयोग ने भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य नाम से जो रिपोर्ट जारी की है, वह सीधे तौर पर ग्लोबल मार्केट में भारत के दबदबे की कहानी कहती है। इस रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि हमें दुनिया की भीड़ के पीछे चलकर केवल दूसरों की नकल नहीं करनी है। इसके बजाय, भारत को अपनी रणनीतिक ताकत के दम पर एक ऐसी मजबूत जगह बनानी होगी, जिसके बिना वैश्विक सप्लाई चेन का काम ही न चल सके। लक्ष्य यह तय किया गया है कि 2035 तक देश के भीतर 120 से 150 अरब डॉलर की एक विशाल सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन खड़ी की जाए। यह ग्लोबल मार्केट में भारत की बादशाहत कायम करने का ब्लूप्रिंट है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को सिर्फ चिप का बाजार बनकर नहीं रहना है, बल्कि इस पूरी ग्लोबल इंडस्ट्री का लीडर बनना है। इसके लिए अगले दस वर्षों में 135 से 180 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत बताई गई है।

विदेशी निर्भरता होगी खत्म और देश की गाढ़ी कमाई बचेगी

आज की कड़वी सच्चाई यह है कि हमारी घरेलू जरूरत का 90 से 95 प्रतिशत सेमीकंडक्टर विदेशों से मंगाया जाता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2035 तक सिर्फ भारत में चिप की मांग 200 अरब डॉलर के पार पहुंच जाएगी। यह बड़ी चिंता का विषय है कि अगर इतना बड़ा हिस्सा हम बाहर से ही खरीदते रहे, तो विदेशी मुद्रा के रूप में देश का बहुत सारा पैसा बाहर चला जाएगा। इसके अलावा, अगर कभी वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में कोई दिक्कत आई, तो हमारे कई महत्वपूर्ण उद्योग पूरी तरह से ठप पड़ सकते हैं। इसीलिए इस आयात को कम करना समय की सबसे बड़ी मांग है। घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ने से न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि देश की आर्थिक सुरक्षा भी मजबूत होगी।

सरकार को खोलनी होगी तिजोरी और निवेश का नया फॉर्मूला

देश में चिप डिजाइनिंग, मैन्युफैक्चरिंग से लेकर एडवांस पैकेजिंग का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए भारी-भरकम पूंजी चाहिए। एक अनुमान के मुताबिक, अगले दस सालों में इसके लिए 135 से 180 अरब डॉलर के कुल निवेश की दरकार होगी। नीति आयोग ने सरकार को एक बेहद अहम सुझाव दिया है और प्राइवेट कंपनियों का भरोसा जीतने के लिए इस पूरे निवेश का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा खुद भारत सरकार को अपनी जेब से देना चाहिए। जब सरकार खुद चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों के बुनियादी ढांचे पर पैसा लगाएगी, तो प्रोजेक्ट्स का जोखिम कम होगा। इससे बड़ी-बड़ी प्राइवेट कंपनियां लंबे समय के लिए भारत में सुरक्षित निवेश कर पाएंगी। यह सरकारी निवेश निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए एक उत्प्रेरक का काम करेगा।

क्यों जरूरी है चिप और प्रौद्योगिकी संप्रभुता?

नीति आयोग के वाइस चेयरमैन अशोक कुमार लाहिड़ी ने स्पष्ट किया है कि विकसित राष्ट्र बनने के लिए दूसरों की तकनीक पर निर्भरता खत्म करनी होगी। इसे प्रौद्योगिकी संप्रभुता कहा जाता है। आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रक्षा उपकरण, टेलीकॉम सेक्टर, ट्रांसपोर्ट से लेकर आम नागरिक सेवाएं तक इसी छोटी सी चिप के सहारे चलती हैं। 2014 से 2024 के बीच वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार 6 दशमलव 5 प्रतिशत की तेज रफ्तार से बढ़ा है। आने वाले सालों में इसके 8 दशमलव 5 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है। भारत इस विकास दर का लाभ उठाकर वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है। यदि भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनता है, तो वह न केवल अपनी जरूरतों को पूरा करेगा बल्कि दुनिया को चिप निर्यात करने वाला प्रमुख देश भी बन जाएगा।