अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सीधी और कड़ी धमकियों के बाद ईरान ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में गिरफ्तार किए गए लोगों को फांसी देने के अपने पूर्व घोषित फैसले से पीछे हटने का संकेत दिया है और यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण राहत लेकर आया है, जो ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर चिंतित था। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने बुधवार को स्पष्ट रूप से कहा कि ईरान की ओर से किसी भी प्रदर्शनकारी को फांसी देने की कोई योजना नहीं है, जिससे पहले की घोषणाओं पर विराम लग गया।
ईरानी विदेश मंत्री का बयान
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने फॉक्स न्यूज के 'स्पेशल रिपोर्ट विद ब्रेट बेयर' कार्यक्रम में दिए एक साक्षात्कार में इस बात पर जोर दिया कि फांसी देने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा, 'फांसी का तो सवाल ही नहीं उठता और ' यह बयान ईरान के भीतर और बाहर दोनों जगह एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, क्योंकि इससे पहले ईरानी सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर त्वरित सुनवाई और जल्द से जल्द फांसी देने का ऐलान किया था। इस घोषणा ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी थी और अमेरिका सहित कई देशों ने इसकी कड़ी निंदा की थी और अराकची का यह बयान ईरान की ओर से बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के प्रति एक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।
ट्रम्प की चेतावनी और दावा
ईरान के इस यू-टर्न के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सीधी और स्पष्ट चेतावनी को एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। ट्रम्प ने ईरान को कड़ा जवाब देने की धमकी दी थी, जिसमें उन्होंने कहा था, 'अगर वे फांसी देते हैं, तो आप कुछ भयानक देखेंगे। ' यह धमकी ईरान के लिए एक गंभीर चेतावनी थी, जिसने संभवतः तेहरान को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया और बुधवार को ट्रम्प ने भी बताया कि ईरान में प्रदर्शनकारियों की हत्याएं रुक गई हैं, जो उनकी धमकियों के प्रभाव को दर्शाता है। ट्रम्प प्रशासन ने लगातार ईरान पर मानवाधिकारों के उल्लंघन और विरोध प्रदर्शनों के दमन को लेकर दबाव बनाया है।
इरफान सुलतानी का मामला
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में 26 वर्षीय प्रदर्शनकारी इरफान सुलतानी का मामला था, जिसे ईरान बुधवार को फांसी देने वाला था। द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, इरफान को 8 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था और मात्र तीन दिनों के भीतर, 11 जनवरी को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। सुलतानी पर 'मोहरेबेह' (भगवान के खिलाफ युद्ध छेड़ना) का आरोप लगाया गया था, जो ईरानी कानून में सबसे गंभीर अपराधों में से एक है और इसकी सजा मौत होती है और मानवाधिकार संगठनों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि सुलतानी को उचित सुनवाई, वकील या अपील का मौका नहीं दिया गया। उनकी फांसी टलने से मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को एक बड़ी राहत मिली है।
मानवाधिकारों पर चिंताएं और न्यायिक प्रमुख का रुख
मानवाधिकार संगठन और निर्वासित कार्यकर्ता लगातार ईरान में 'फास्ट-ट्रैक एक्जीक्यूशन' (रैपिड/शो ट्रायल) की प्रथा पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं और उनका मानना है कि सरकार का मकसद डर फैलाकर हजारों अन्य प्रदर्शनकारियों को चुप कराना है, जिन्हें गिरफ्तार किया गया है। नॉर्वे स्थित ईरान मानवाधिकार समूह (आईएचआर) के अनुसार, चीन के बाद ईरान दुनिया का दूसरा देश है जहां सजा के तौर पर सबसे ज्यादा लोगों को फांसी दी जाती है। पिछले साल ईरान ने कम से कम 1,500 लोगों को फांसी दी थी और इसके विपरीत, ईरान के न्यायपालिका प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी-एजेई ने बुधवार को कहा था कि सरकार को हिरासत में लिए गए लोगों को फास्ट ट्रायल और फांसी के जरिए जल्द से जल्द सजा देनी होगी। उन्होंने तर्क दिया था कि सजा में देरी से उसका असर कम हो जाता है।
ईरान की ट्रम्प को धमकी और नो-फ्लाई जोन
इस तनावपूर्ण माहौल में, ईरान ने सरकारी टीवी चैनल पर राष्ट्रपति ट्रम्प को जान से मारने की धमकी जारी की थी। एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह धमकी पर्शियन में थी और इसमें पेंसिल्वेनिया के बटलर में 2024 में ट्रम्प पर हुए जानलेवा हमले की फुटेज दिखाई गई थी, जिसके साथ एक संदेश था 'इस बार गोली निशाने से नहीं चूकेगी'। यह ट्रम्प के खिलाफ तेहरान की अब तक की सबसे सीधी धमकी थी। इसके अलावा, अमेरिका के साथ व्यापक विरोध प्रदर्शनों और तनाव के बीच ईरान ने बुधवार को 2 घंटे के लिए अधिकांश उड़ानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया था। फ्लाइटराडार24 के अनुसार, तेहरान ने बुधवार शाम 5 बजे के तुरंत बाद 'नोटिस टू एयर मिशन्स' (नोटम) चेतावनी जारी की और ईरान से आने-जाने वाली अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को छोड़कर सभी उड़ानों पर रोक लगा दी गई। इस प्रतिबंध से इंडिगो, लुफ्थांसा और एयरोफ्लोट सहित कई एयरलाइंस प्रभावित हुईं।
अंतर्राष्ट्रीय यात्रा सलाह और भारत की भूमिका
ईरान में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को देखते हुए, भारत सरकार ने बुधवार को अपने नागरिकों के लिए एक एडवाइजरी जारी की और इसमें कहा गया है कि जो भी भारतीय नागरिक, चाहे वे छात्र हों, तीर्थयात्री हों, व्यापारी हों या पर्यटक, इस समय ईरान में हैं, उन्हें जल्द से जल्द वहां से निकल जाना चाहिए। ईरान में अभी 10 हजार से ज्यादा भारतीय हैं। यह सलाह 5 जनवरी की पिछली एडवाइजरी के आगे की कड़ी। थी और ईरान की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए दी गई थी। भारत के अलावा, स्पेन, इटली और पोलैंड की सरकारों ने भी अपने नागरिकों को ईरान छोड़ने की सलाह दी है। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बुधवार देर शाम ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से फोन पर ईरान से जुड़े हालातों पर बात की, जो भारत की चिंता को दर्शाता है।
विरोध प्रदर्शनों के मूल कारण और हताहतों की संख्या
ईरान में 28 दिसंबर से शुरू हुई हिंसा कई गहरे कारणों से भड़की है। और इसे अब तक के सबसे बड़े प्रदर्शनों में से एक माना जा रहा है। ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत इतिहास में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है, जिससे 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 1,455,000 से 1,457,000 रियाल हो गई है। चाय, ब्रेड जैसी रोजमर्रा की चीजें भी बहुत महंगी हो गई हैं, जिसमें महंगाई 50-70% से ज्यादा है। 28 दिसंबर 2025 को तेहरान के बड़े बाजार के व्यापारियों ने दुकानें। बंद कर विरोध शुरू किया, जो तेजी से पूरे देश में फैल गया। लोग सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई और इस्लामिक रिपब्लिक की पूरी व्यवस्था के खिलाफ नारे लगा। रहे हैं, कई लोग पुरानी राजशाही (शाह का शासन) वापस लाने की मांग कर रहे हैं। नॉर्वे स्थित ईरान ह्यूमन राइट्स (आईएचआर) एनजीओ ने बुधवार को बताया कि प्रदर्शनों पर कार्रवाई के दौरान ईरानी सुरक्षा बलों। ने कम से कम 3,428 प्रदर्शनकारियों को मार डाला है और 10,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। ईरान इंटरनेशनल ने दावा किया है कि देश भर में कम से कम 12 हजार लोगों की मौत हुई है, जिनमें ज्यादातर लोग गोली लगने से मारे गए हैं।
क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की बढ़ती मांग
ईरान आज आर्थिक संकट, भारी महंगाई, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, बेरोजगारी, मुद्रा गिरावट और लगातार जन आंदोलनों जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी सत्ता में आए और उनके। बाद अयातुल्ला अली खामेनेई 1989 से अब तक 37 साल से सत्ता में हैं। मौजूदा आर्थिक बदहाली और सख्त धार्मिक शासन से नाराज लोग अब बदलाव चाहते हैं। इसी कारण 65 वर्षीय क्राउन प्रिंस रजा पहलवी को सत्ता सौंपने की मांग उठ रही है। प्रदर्शनकारी उन्हें एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विकल्प मानते हैं। युवाओं और जेन जी को लगता है कि पहलवी की वापसी से ईरान को आर्थिक स्थिरता, वैश्विक स्वीकार्यता और व्यक्तिगत आजादी मिल सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी पहलवी को 'काफी अच्छे' बताया, हालांकि उन्होंने उनके आंतरिक समर्थन पर अनिश्चितता जताई।