मुज्तबा काल की शुरुआत: ईरान की हिट लिस्ट में ट्रंप और नेतन्याहू के साथ खाड़ी देशों के राजा शामिल

ईरान में मुज्तबा काल की शुरुआत के साथ ही अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का बदला लेने के लिए नई हिट लिस्ट तैयार की गई है। इसमें डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू के अलावा सऊदी अरब, यूएई और बहरीन के शासकों को शामिल करने की मांग उठी है।

मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है क्योंकि ईरान अब मुज्तबा काल में प्रवेश कर चुका है। यह बदलाव युद्ध की शुरुआत में अमेरिका द्वारा ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद हुआ है। मुज्तबा के उदय ने ईरान की आक्रामकता को एक नई गति दी है, जिसके परिणामस्वरूप एक हाई-प्रोफाइल हिट लिस्ट को औपचारिक रूप दिया जा रहा है और सुप्रीम लीडर का पद ईरान में सर्वोच्च है और अब देश अपने पूर्व नेता की मौत का बदला लेने के लिए बेताब है।

विस्तारित हिट लिस्ट और नए निशाने

ईरान ने एक टारगेट लिस्ट तैयार की है जिसमें दुनिया की प्रमुख हस्तियां शामिल हैं। इस लिस्ट में सबसे ऊपर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम है, जिसके बाद इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का नाम आता है। हालांकि, अब ईरान के राजनीतिक हलकों में एक नई और महत्वपूर्ण मांग उठी है और ईरानी सांसद अमीरहोसैन साबेती ने सरकार से मांग की है कि उन अरब देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी इस लिस्ट में शामिल किया जाए जिन्होंने अमेरिका की मदद की है। उनका तर्क है कि जिन देशों ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियानों के लिए अपनी जमीन और हवाई क्षेत्र उपलब्ध कराया, वे पूर्व सुप्रीम लीडर की हत्या में बराबर के भागीदार हैं।

इससे पहले ईरान का रुख यह था कि उसकी अपने पड़ोसी देशों से कोई दुश्मनी नहीं है और उसका ध्यान केवल अमेरिकी सैन्य ठिकानों और उपकरणों पर था। लेकिन अब यह नीति पूरी तरह बदलने जा रही है। ईरान अब उन पड़ोसी देशों के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने की सौगंध ले रहा है जो अमेरिका का समर्थन करते हैं और यह मांग विशेष रूप से उन खाड़ी देशों के राजाओं को निशाना बनाती है जिन्होंने अमेरिकी सेना को अपनी जमीन दी। इस नीति परिवर्तन ने तीन प्रमुख राजवंशों को खतरे में डाल दिया है: सऊदी अरब का अल सऊद राजवंश, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का अल नाहयान राजवंश और बहरीन का अल खलीफा राजवंश।

खतरे में खाड़ी देशों के प्रमुख शासक

यह खतरा इन तीनों देशों के शासन के सर्वोच्च स्तर तक फैला हुआ है और बहरीन में अल खलीफा परिवार 1783 से शासन कर रहा है। वर्तमान राजा किंग हमद बिन ईसा अल खलीफा के पास देश की सर्वोच्च शक्तियां हैं, जबकि उनके सबसे बड़े बेटे क्राउन प्रिंस सलमान बिन हमद अल खलीफा देश के प्रधानमंत्री हैं। इन दोनों को अब संभावित लक्ष्यों के रूप में देखा जा रहा है और संयुक्त अरब अमीरात में 7 अमीरात शामिल हैं, जिनमें अल नाहयान और अल मकतूम परिवार सबसे शक्तिशाली हैं। अबू धाबी के शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान राष्ट्रपति हैं और शेख मोहम्मद बिन राशद अल मकतूम यूएई के प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें ईरान की हिट लिस्ट के संदर्भ में देखा जा रहा है।

सऊदी अरब में सऊद राजवंश मुख्य केंद्र है और किंग सलमान बिन अब्दुल अजीज अल सऊद और उनके बेटे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, जो प्रधानमंत्री और वास्तविक शासक हैं, उन प्रमुख नामों में शामिल हैं जिन्हें हिट लिस्ट में जोड़ने की मांग की गई है। ईरान की रणनीति खाड़ी देशों के नेतृत्व में डर पैदा करने की है ताकि उन्हें अमेरिका से दूर किया जा सके। शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर ईरान क्षेत्र से अमेरिकी सेना को बाहर निकालने का दबाव बनाना चाहता है।

कतर के साथ विवाद और लापता पायलट

क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाते हुए ईरान और कतर के बीच एक विशेष विवाद भी सामने आया है। ईरान का आरोप है कि कतर ने मार्च से उसके 3 पायलटों को अपनी कैद में रखा हुआ है। इस विवाद की जड़ें 2 मार्च की घटना से जुड़ी हैं, जब ईरान ने कतर में अल-उदैद एयरबेस पर हमला किया था। दो सुखोई 24 लड़ाकू विमानों ने इस हमले को अंजाम दिया था, जो अमेरिकी हवाई सुरक्षा और रडार से बचने के लिए काफी नीचे उड़ान भर रहे थे। इस दौरान कतर के F-15 जेट विमानों ने उड़ान भरी और ईरानी विमानों को निशाना बनाया। F-15 के हमले के कारण दोनों सुखोई 24 जेट फारस की खाड़ी के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे।

ईरान का दावा है कि मिशन में शामिल सभी 4 पायलट विमान से सुरक्षित बाहर निकल गए थे। कतर ने 1 पायलट का शव मिलने की सूचना दी थी, लेकिन ईरान का कहना है कि बाकी 3 पायलट कतर की गुप्त कैद में हैं। कतर ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उसने किसी भी ईरानी पायलट को बंदी नहीं बनाया है। यह घटना तनाव का एक बड़ा कारण बन गई है, खासकर तब जब अरब देश अमेरिका की ठोस रणनीति की कमी और ईरानी आक्रामकता को लेकर चिंतित हैं।

मक्का रक्षा समझौता और इस्लामिक नाटो

बढ़ते खतरों और अमेरिका पर कम होते भरोसे के बीच कई इस्लामिक देश एक नए सैन्य गठबंधन की ओर बढ़ रहे हैं। नाटो की तर्ज पर बनाए जा रहे इस ढांचे को इस्लामिक नाटो कहा जा रहा है। 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक रणनीतिक और सैन्य समझौता हुआ। इसे मक्का रक्षा समझौते के नाम से जाना जाता है, जिसके तहत यह तय किया गया है कि तीनों में से किसी भी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

यह समझौता नाटो के आर्टिकल 5 के समान है, जो एक सामूहिक रक्षा तंत्र सुनिश्चित करता है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब खाड़ी देश वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था की तलाश कर रहे हैं। अमेरिकी हथियारों के स्टॉक खत्म होने की खबरों और ईरानी धमकियों के खिलाफ अमेरिका की निष्क्रियता को देखते हुए सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान अपने सैन्य संबंधों को मजबूत कर रहे हैं ताकि क्षेत्रीय स्थिरता और बाहरी हमलों से सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।