देश के राजनीतिक गलियारों में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने एक बार फिर मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह सहित कई विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार पर संविधान के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया है और विपक्ष का कहना है कि ज्ञानेश कुमार का पद पर बने रहना देश के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा है। यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की एक हालिया टिप्पणी के बाद और अधिक गहरा गया है, जिसमें उन्होंने मतदान के अधिकारों और संवैधानिक प्रक्रियाओं को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही थीं।
जयराम रमेश का तीखा हमला और इस्तीफे की मांग
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधा प्रहार किया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी के बाद ज्ञानेश कुमार को अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है और उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए। रमेश ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के प्रमुख के रूप में ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली देश के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी में जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने जिस बेबाकी से अपनी बात रखी, उसने CEC की पोल-पट्टी खोलकर रख दी है और जयराम रमेश ने आगे कहा कि अगर ज्ञानेश कुमार में जरा भी शर्म-लिहाज बची है, तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि G2 के गैर-कानूनी आदेशों को लागू करने की उनकी क्षमता ने उन्हें अब देश के लिए एक बोझ बना दिया है।
दिग्विजय सिंह ने दी जेल जाने की चुनौती
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने भी इस मुद्दे पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है और उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि वह भारत में लोकतंत्र को बचाने और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के नागरिकों के अधिकारों का मुद्दा उठाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज उज्ज्वल भुइयां को बधाई देते हैं। सिंह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को संबोधित करते हुए कहा कि अब उनके करियर में खोने के लिए कुछ नहीं बचा है, सिवाय शायद रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों के। उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि वह अदालत की अवमानना कर रहे हैं, तो वह जेल जाने के लिए भी पूरी तरह तैयार हैं और दिग्विजय सिंह ने अपने लंबे राजनीतिक अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि वह 1972 से सार्वजनिक जीवन में हैं और 1977 से राज्य और केंद्रीय विधानसभाओं या संसद के सदस्य रहे हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के प्रति उनका हमेशा सम्मान रहा है, लेकिन उन्होंने कभी भी चुनाव आयोग द्वारा नागरिकों के अधिकारों के खिलाफ इतनी एकतरफा ज्यादती होते नहीं देखी और उन्होंने ज्ञानेश कुमार से कहा कि उन्हें शर्म आनी चाहिए और इस्तीफा दे देना चाहिए, क्योंकि इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
सागरिका घोष ने साधा निशाना
तृणमूल कांग्रेस (TMC) की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने भी जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी का समर्थन करते हुए ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिक अपने अधिकारों से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया पूरी तरह से मनमानी है। घोष ने तर्क दिया कि इसे किसी भी बहाने से सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह संविधान की मूल भावना पर सीधा प्रहार है। उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने अब CEC ज्ञानेश कुमार के अपराध को स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब शीर्ष अदालत के अन्य जजों की अंतरात्मा भी इस घोर अन्याय के खिलाफ जागेगी। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को कठपुतली बताते हुए कहा कि वह बेशर्मी से अपनी कुर्सी से चिपके हुए हैं।
जस्टिस भुइयां की टिप्पणी का पूरा संदर्भ
यह पूरा विवाद जस्टिस उज्ज्वल भुइयां के उस संबोधन से शुरू हुआ जो उन्होंने रविवार 4 अक्टूबर को हैदराबाद में NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के एक कार्यक्रम में दिया था। जस्टिस भुइयां ने कहा था कि किसी भी तरह की दलीलें वोटिंग का अधिकार छीनने को सही नहीं ठहरा सकतीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मिले वोटिंग के अधिकार से कोई भी छेड़छाड़ नहीं कर सकता। उनके अनुसार, ऐसी कोई भी प्रक्रिया मनमानी है जो लाखों भारतीयों को उनके मतदान के अधिकार से रोकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी प्रक्रिया संवैधानिक व्यवस्था को पूरी तरह से नकारती है और इसे किसी भी तर्क से उचित नहीं माना जा सकता। जस्टिस भुइयां की इसी टिप्पणी को आधार बनाकर अब पूरा विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे पर अड़ा हुआ है।
