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- 07-Nov-2025 02:09 PM IST
प्रसिद्ध बॉलीवुड गायिका और अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित का गुरुवार शाम 7 बजे मुंबई में 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन का कारण हृदय गति रुकना बताया गया है। वे काफी समय से अस्वस्थ थीं और उन्होंने मुंबई के नानावटी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां शुक्रवार को विले पारले (मुंबई) के पवन हंस श्मशान घाट में शुरू हो गई हैं, जहां बॉलीवुड की कई हस्तियां उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचीं।
समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए, सुलक्षणा पंडित के भाई ललित पंडित ने बताया कि। उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी और उनकी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। परिवार उन्हें तुरंत नानावटी अस्पताल ले जा रहा था, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनका निधन हो गया। यह खबर बॉलीवुड और संगीत जगत में शोक की लहर लेकर आई है, क्योंकि उन्होंने एक। बहुमुखी प्रतिभा को खो दिया है जिसने अपनी आवाज और अभिनय से लाखों दिलों पर राज किया। सुलक्षणा पंडित का जन्म 12 जुलाई 1954 को हुआ था और वे एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती थीं जिसकी जड़ें संगीत में गहरी थीं। उनके चाचा महान शास्त्रीय गायक पंडित जसराज थे, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत में अपना अमूल्य योगदान दिया। उनके परिवार में तीन भाई और तीन बहनें थीं। उनके भाई जतिन और ललित आज भी बॉलीवुड में मशहूर संगीत निर्देशक के रूप में जाने जाते हैं, जबकि उनकी बहन विजयता पंडित ने भी अभिनेत्री और पार्श्व गायिका के रूप में अपनी पहचान बनाई है।एक असाधारण संगीत यात्रा
सुलक्षणा पंडित ने मात्र 9 साल की उम्र में गाना शुरू कर दिया था, जो उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण था। उनकी आवाज में एक अनूठी मिठास और गहराई थी जिसने उन्हें जल्द ही संगीत जगत में पहचान दिलाई। 1967 की फिल्म 'तकदीर' में उन्होंने लता मंगेशकर जैसी महान गायिका के साथ मिलकर। मशहूर गीत 'सात समुंदर पार से' गाया, जो उनकी शुरुआती सफलताओं में से एक था। उनकी गायकी को 1975 में फिल्म 'संकल्प' के गाने 'तू ही सागर है तू ही किनारा' के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, जो उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। उन्होंने किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, येशुदास और उदित नारायण जैसे दिग्गज गायकों के साथ युगल गीत गाए, जिससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा और भी निखर कर सामने आई। 1980 में, उनका एल्बम 'जज्बात' (HMV) रिलीज़ हुआ, जिसमें उन्होंने अपनी भावपूर्ण गजलों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान तब बनी जब उन्होंने 1986 में लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में 'फेस्टिवल ऑफ इंडियन म्यूजिक' में प्रस्तुति दी और उनकी आवाज आखिरी बार 1996 की फिल्म 'खामोशी: द म्यूजिकल' के गाने 'सागर किनारे भी दो दिल' में सुनाई दी थी, जिसे उनके भाइयों जतिन-ललित ने संगीतबद्ध किया था।
