बांग्लादेश में आगामी 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों से पहले राजनीतिक सरगर्मी तेज है, लेकिन इस बार का चुनाव एक बड़े संकट के साये में है और देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक संगठन, बांग्लादेश हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल (BHDCU) ने चुनावों के बहिष्कार का संकेत देकर सरकार और चुनाव आयोग की नींद उड़ा दी है। संगठन का आरोप है कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार, हत्याएं और असुरक्षा का माहौल उन्हें मतदान केंद्रों तक जाने से रोक रहा है।
अल्पसंख्यकों में खौफ और हिंसा का तांडव
ढाका में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान BHDCU के नेताओं ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। संगठन के अनुसार, केवल जनवरी 2026 के शुरुआती 27 दिनों में ही सांप्रदायिक हिंसा की 42 घटनाएं दर्ज की गई हैं और इनमें 11 हिंदुओं की हत्या और एक बलात्कार की घटना शामिल है। इसके अलावा, नौ मंदिरों और चर्चों पर हमले हुए हैं और नौ स्थानों पर लूटपाट की गई है। इन घटनाओं ने अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर गहरे डर और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।
हेट स्पीच और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
संगठन का कहना है कि चुनाव से पहले हेट स्पीच यानी नफरती भाषणों की बाढ़ आ गई है। सांप्रदायिक समूहों द्वारा दिए जा रहे भड़काऊ बयानों के कारण धार्मिक और हाशिए पर पड़े समुदायों पर हमले बढ़ रहे हैं। BHDCU ने स्पष्ट किया कि नफरत भरे ये बयान न केवल सांप्रदायिक सद्भाव को खत्म कर रहे हैं, बल्कि एक गहरा सामाजिक बंटवारा भी पैदा कर रहे हैं। महिलाओं और बच्चों में इस स्थिति को लेकर भारी दहशत है, जिससे वे घर से बाहर निकलने में भी कतरा रहे हैं।
रेफरेंडम पर गंभीर आपत्ति
इस बार के चुनाव में मतदाताओं को दो बैलेट पेपर दिए जाएंगे। एक सांसद चुनने के लिए और दूसरा संवैधानिक संशोधन पर रेफरेंडम (जनमत संग्रह) के लिए और अल्पसंख्यकों ने इस रेफरेंडम पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जिस तरह से सेक्युलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) को दरकिनार कर राज्य शासन के बुनियादी सिद्धांतों में बदलाव की कोशिश हो रही है, वह अल्पसंख्यकों के अधिकारों को खत्म कर देगा। संगठन का मानना है कि यह कदम बांग्लादेश के 1971 के मुक्ति संग्राम के मूल्यों और शहीदों के सपनों के खिलाफ है।
सुरक्षा की गारंटी और 8-सूत्रीय मांग
अल्पसंख्यक समुदाय ने सरकार और राजनीतिक दलों के सामने 8-सूत्रीय मांग पत्र रखा है। उनकी प्रमुख मांगों में एक 'माइनॉरिटी प्रोटेक्शन एक्ट' (अल्पसंख्यक संरक्षण कानून) बनाना, एक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन करना और एक अलग अल्पसंख्यक मंत्रालय की स्थापना करना शामिल है और संगठन ने मांग की है कि चुनाव लड़ने वाले सभी दल यह सार्वजनिक वादा करें कि चुनाव के बाद अल्पसंख्यकों को उनके वोटिंग पैटर्न के आधार पर निशाना नहीं बनाया जाएगा।
राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी
BHDCU के नेताओं ने साफ कहा कि हिंदू या अन्य अल्पसंख्यक किसी भी राजनीतिक दल के 'गुलाम' नहीं हैं। हालांकि वे ऐतिहासिक रूप से लिबरेशन वॉर की विचारधारा का समर्थन करते रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वे अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देंगे। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार, प्रशासन और चुनाव आयोग अल्पसंख्यकों के मन में विश्वास पैदा करने में विफल। रहते हैं, तो वे चुनाव से पूरी तरह दूरी बना सकते हैं, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सत्ता पक्ष और चुनाव आयोग की होगी।