ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 से जो महत्वपूर्ण बातें निकलकर सामने आई हैं, वे इस बात का संकेत देती हैं कि यह मंच अब केवल कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट कर नहीं रह गया है। इस सम्मेलन के दौरान जो एजेंडा सामने आया है, वह वैश्विक व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। नई दिल्ली के घोषणापत्र में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि ब्रिक्स अब केवल आर्थिक सहयोग और डॉलर के विकल्प की चर्चा तक सीमित नहीं है। इसके दायरे में अब वैश्विक संस्थाओं में सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी, एआई और क्वांटम जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हो चुके हैं। इस पूरी कवायद के पीछे एक बड़ी सोच यह है कि वर्तमान वर्ल्ड ऑर्डर में विकासशील देशों की हिस्सेदारी और उनके प्रभाव को प्रभावी ढंग से बढ़ाया जाए।
ग्लोबल गवर्नेंस और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की मांग
घोषणापत्र में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ग्लोबल गवर्नेंस को लेकर देखा गया है। ब्रिक्स ने संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व बैंक, आईएमएफ और डब्ल्यूटीओ जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक सुधार की मांग की है। ब्रिक्स का तर्क है कि इन संस्थाओं का प्रतिनिधित्व दुनिया की बदली हुई वास्तविकताओं के अनुरूप होना चाहिए ताकि वे अधिक न्यायसंगत बन सकें। भारत के दृष्टिकोण से यह विकास अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और रूस जैसे देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की बड़ी और अधिक सक्रिय भूमिका का समर्थन किया है। यह सामूहिक मांग दर्शाती है कि ब्रिक्स देश अब वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अधिक वजन चाहते हैं।
वित्तीय व्यवस्था और स्थानीय मुद्राओं को बढ़ावा
वित्तीय व्यवस्था के मोर्चे पर भी ब्रिक्स के भीतर गहन चर्चा हो रही है। हालांकि इस समूह का वर्तमान में ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है कि वे किसी नई साझा करेंसी को लॉन्च करें, लेकिन सदस्य देशों के बीच इस बात पर पूर्ण सहमति है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके लिए भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने, वित्तीय कनेक्टिविटी बढ़ाने और न्यू डेवलपमेंट बैंक को और अधिक सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि दुनिया के देशों के पास वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अधिक विकल्प उपलब्ध हों और वे किसी एक विशेष सिस्टम पर पूरी तरह से निर्भर न रहें। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में विविधता और स्थिरता आने की उम्मीद है।
ब्रिक्स का विस्तार और ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज
ब्रिक्स अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रह गया है, बल्कि इसका विस्तार हो चुका है। नए सदस्य देशों के जुड़ने से इस समूह की सामूहिक शक्ति में भारी वृद्धि हुई है। विस्तार के बाद, ग्लोबल साउथ के देशों को विकास वित्त, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ग्लोबल गवर्नेंस जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक साथ मिलकर अपनी बात रखने के लिए एक बहुत बड़ा और प्रभावशाली मंच मिल गया है। यह विस्तार ब्रिक्स को वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक नई धुरी के रूप में स्थापित कर रहा है, जो विकासशील दुनिया के हितों की रक्षा करने में सक्षम है।
व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन पर ध्यान
व्यापार के क्षेत्र में ब्रिक्स ने एकतरफा टैरिफ, संरक्षणवाद और आर्थिक दबाव की नीतियों का कड़ा विरोध किया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि समूह केवल फ्री ट्रेड की बात कर रहा है, बल्कि वह इस सवाल को उठा रहा है कि ग्लोबल ट्रेड के नियम आखिर कौन बनाता है और क्या वे नियम विकासशील देशों के हितों के साथ न्याय करते हैं। इसके साथ ही मैन्युफैक्चरिंग का मुद्दा भी काफी अहम बनकर उभरा है। ब्रिक्स का फोकस अब एमएसएमई, ग्लोबल वैल्यू चेन और मजबूत सप्लाई चेन के निर्माण पर बढ़ रहा है। यह इस बात का संकेत है कि सदस्य देश अब केवल कच्चा माल या सस्ता लेबर सप्लाई करने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे ग्लोबलाइजेशन से पैदा होने वाली वैल्यू में एक बड़ा हिस्सा हासिल करना चाहते हैं। यह लक्ष्य सीधे तौर पर भारत के अपने मैन्युफैक्चरिंग उद्देश्यों से मेल खाता है।
तकनीक और सामरिक शक्ति के रूप में एआई
टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एआई, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वांटम टेक्नोलॉजी और कनेक्टिविटी जैसे विषय अब ब्रिक्स के मुख्य एजेंडे का हिस्सा बन गए हैं। इससे यह साफ हो जाता है कि तकनीक अब केवल आर्थिक विकास का एक जरिया मात्र नहीं रह गई है, बल्कि यह रणनीतिक और जियो पॉलिटिक्स की ताकत का एक प्रमुख आधार भी बनती जा रही है। ब्रिक्स देश इन आधुनिक तकनीकों में सहयोग करके यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वे भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में पीछे न छूटें और तकनीकी विकास का लाभ सभी विकासशील देशों तक पहुंचे।
आतंकवाद के खिलाफ कड़ा और स्पष्ट रुख
आतंकवाद के मोर्चे पर भी ब्रिक्स ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। समूह ने आतंकवाद, आतंक की फंडिंग, आतंकियों की सीमा-पार आवाजाही और उन्हें मिलने वाले सुरक्षित पनाहगाहों जैसे गंभीर मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाया है। इसी संदर्भ में, ब्रिक्स ने 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है। यह दर्शाता है कि ब्रिक्स केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक सुरक्षा और शांति के लिए भी प्रतिबद्ध है। आतंकवाद के खिलाफ यह एकजुटता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत संदेश देती है।
निष्कर्ष: एक नई वैश्विक दिशा की ओर कदम
यदि इन सभी बदलावों और मांगों को समग्र रूप से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि ब्रिक्स रातों-रात कोई नया वर्ल्ड ऑर्डर नहीं बना रहा है। इसके बजाय, वह धीरे-धीरे आर्थिक, वित्तीय, तकनीकी और राजनीतिक विकल्पों के माध्यम से उन देशों के लिए अधिक जगह बनाने की कोशिश कर रहा है जो पारंपरिक पावर सेंटर्स से बाहर हैं। ब्रिक्स की यह पहल वैश्विक व्यवस्था को अधिक समावेशी और संतुलित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय करेगी।