दुनिया के मानचित्र पर एक दूरस्थ और बर्फीला द्वीप, ग्रीनलैंड, अब अचानक वैश्विक राजनीति का केंद्र बन गया है और आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से पिघलती बर्फ ने इस विशाल भूभाग को एक ऐसे हॉटस्पॉट में बदल दिया है, जहां दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें – अमेरिका, रूस और चीन – अपनी रणनीतिक और आर्थिक पकड़ मजबूत करने की होड़ में हैं। यह सिर्फ जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का एक नया मैदान। है, जहां लाखों टन दुर्लभ खनिजों और नए व्यापारिक मार्गों पर सबकी नजर है।
ग्रीनलैंड की बढ़ती अहमियत और दुर्लभ खनिज भंडार
ग्रीनलैंड की अहमियत में यह अचानक उछाल मुख्य रूप से दो बड़े कारणों से आया है: पहला, वैश्विक तापमान में वृद्धि और आर्कटिक की बर्फ का तेजी से पिघलना; और दूसरा, इस पिघलती बर्फ के नीचे छिपे अथाह प्राकृतिक संसाधन। द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीनलैंड दुर्लभ खनिजों के मामले में दुनिया में आठवें स्थान पर है, और यहां अनुमानित 15 लाख टन खनिज भंडार मौजूद है। ये खनिज, विशेष रूप से नियोडायमियम, प्रासियोडायमियम, डिस्प्रोसियम, टर्बियम और यूरेनियम, आधुनिक तकनीक और इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जैसे-जैसे बर्फ कम हो रही है, नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और जमीन के नीचे दबे ये कीमती संसाधन भी अब आसानी से सुलभ होते जा रहे हैं, जिससे ग्रीनलैंड सैन्य, व्यापारिक और प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
ट्रम्प की ग्रीनलैंड पर नजर: एक गंभीर चेतावनी
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी और उस समय, उनके इस बयान को अक्सर राजनीतिक बयानबाजी या एक दिखावा मानकर गंभीरता से नहीं लिया गया था। हालांकि, अब हालात काफी बदल चुके हैं। ट्रम्प अब इस पर 'कब्जा' करने की धमकी दे रहे हैं, और इस बार इसे एक गंभीर चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में ले लेता है, तो यह अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा क्षेत्रीय विस्तार होगा, जो अलास्का और कैलिफोर्निया जैसे बड़े राज्यों से भी विशाल होगा। यह अमेरिका की रणनीतिक पहुंच को आर्कटिक में अभूतपूर्व रूप से बढ़ा देगा, जिससे इस क्षेत्र में अन्य देशों के साथ तनाव और बढ़ सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग का ग्रीनलैंड पर गहरा असर
आर्कटिक क्षेत्र वह जगह है जहां दुनिया की कई बड़ी ताकतें भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के बहुत करीब आ जाती हैं और रूस, कनाडा, अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे देश यहां लगभग आमने-सामने हैं, जिससे इस इलाके को लेकर देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है। इस बढ़ती होड़ की तीन प्रमुख वजहें हैं: पहला, तेल, गैस और दुर्लभ खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों की वैश्विक मांग में वृद्धि;। दूसरा, दुनियाभर में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, जहां हर देश अपनी ताकत और प्रभाव दिखाना चाहता है; और तीसरा, सबसे महत्वपूर्ण कारण, जलवायु परिवर्तन। दुनिया के गर्म होने से आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे वह इलाका जो पहले बर्फ की मोटी चादर के नीचे छिपा रहता था, अब धीरे-धीरे खुलने लगा है और ऐसा प्रतीत होता है जैसे दुनिया के नक्शे पर एक नया, विशाल इलाका अचानक उभर आया हो, और इसी नए अवसर पर कब्जा जमाने के लिए देशों के बीच तीव्र होड़ मची हुई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक में अब नए समुद्री रास्ते बन रहे हैं, जिनका उपयोग व्यापारिक जहाज कर सकते हैं।
ये रास्ते एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच समुद्री यात्रा को काफी छोटा और सस्ता बना सकते हैं, जिससे समय और ईंधन दोनों की बचत होगी। यही कारण है कि दुनिया की बड़ी ताकतों की नजर अब इन संभावित व्यापारिक मार्गों पर है। सिर्फ समुद्री रास्ते ही नहीं, बल्कि बर्फ के नीचे दबे कीमती प्राकृतिक संसाधन भी अब धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। माना जाता है कि ग्रीनलैंड और पूरे आर्कटिक क्षेत्र में तेल, गैस, दुर्लभ खनिज और दूसरी अहम धातुओं का एक विशाल भंडार मौजूद है और जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, इन संसाधनों को निकालना आसान होता जा रहा है, जिससे उनकी आर्थिक व्यवहार्यता बढ़ रही है। यही वजह है कि अमेरिका, रूस और चीन जैसी बड़ी ताकतें इस इलाके में अपनी मौजूदगी बढ़ाने और इन संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। इन सभी कारणों से ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फ से ढंका एक दूरदराज का इलाका नहीं रह गया है, बल्कि यह धीरे-धीरे। वैश्विक राजनीति का एक अहम केंद्र बनता जा रहा है, जहां भविष्य में देशों के बीच टकराव और प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
ग्रीनलैंड का विशाल आकार और रणनीतिक महत्व
ग्रीनलैंड का भौगोलिक आकार उसे और भी अधिक रणनीतिक महत्व प्रदान करता है। यह अकेले ही फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, इटली और जर्मनी जैसे कई यूरोपीय देशों को मिलाकर भी उनसे बड़ा है। इसका क्षेत्रफल लगभग 21 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप बनाता है। यदि ट्रम्प कभी ग्रीनलैंड को अमेरिका के कब्जे में ले आते हैं, तो यह अमेरिका के इतिहास का सबसे बड़ा क्षेत्रीय अधिग्रहण होगा और यह अलास्का और कैलिफोर्निया जैसे बड़े अमेरिकी राज्यों से भी विशाल होगा। ग्रीनलैंड की यह विशालता, उसके रणनीतिक स्थान और प्राकृतिक संसाधनों के साथ। मिलकर, उसे आज दुनिया की राजनीति में इतना अहम बना रही है। यह उत्तरी अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच स्थित है, जो। इसे अमेरिका और यूरोप के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनाता है।
आर्कटिक में बर्फ पिघलने का चौंकाने वाला आंकड़ा
पिछले पांच सालों में आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री बर्फ का औसत क्षेत्रफल घटकर 46 लाख वर्ग किलोमीटर रह गया है। यह 1981 से 2010 के औसत के मुकाबले 27% कम है, जो जलवायु परिवर्तन की भयावह गति को दर्शाता है। जितनी बर्फ पिघल चुकी है, उसका क्षेत्रफल लगभग अफ्रीकी देश लीबिया जितना है, जो इस बात का प्रमाण है कि आर्कटिक कितनी तेजी से बदल रहा है और बर्फ पिघलने की वजह से अब आर्कटिक क्षेत्र में समुद्र लंबे समय तक खुला रहने लगा है। पहले यहां इतनी मोटी बर्फ जमी रहती थी कि आम जहाजों का गुजरना लगभग। नामुमकिन था, और केवल खास आइस ब्रेकर जहाज ही इन इलाकों में जा पाते थे। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं, और सामान्य व्यापारिक जहाज भी इन रास्तों का। इस्तेमाल करने लगे हैं, जिससे वैश्विक व्यापार और परिवहन के नए आयाम खुल रहे हैं।
उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR) और रूस की रणनीति
इन नए समुद्री रास्तों में सबसे अहम नॉर्दर्न सी रूट (उत्तरी समुद्री मार्ग) है और यह रास्ता रूस के आर्कटिक तट के साथ-साथ चलता हुआ यूरोप को एशिया से जोड़ता है। इस रास्ते से जहाजों का सफर काफी छोटा हो जाता है, जिससे समय और ईंधन दोनों की भारी बचत होती है। उदाहरण के लिए, स्वेज नहर के रास्ते की तुलना में यह मार्ग हजारों किलोमीटर की दूरी कम कर देता है। इसी वजह से यह रास्ता तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। और वैश्विक व्यापार के लिए एक आकर्षक विकल्प बन रहा है। रूस के लिए नॉर्दर्न सी रूट सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि उसकी लंबी रणनीति का एक अहम हिस्सा है और रूस इस मार्ग के जरिए व्यापार बढ़ाना चाहता है और आर्कटिक में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। यही कारण है कि वह इस रास्ते पर बंदरगाह, बुनियादी। ढांचे और सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दे रहा है। बर्फ के पिघलने से खुले ये समुद्री रास्ते अब आर्कटिक को दुनिया की बड़ी ताकतों के लिए पहले से कहीं ज्यादा अहम बना रहे हैं। इसके अलावा, कनाडा के आर्कटिक द्वीपों के बीच से गुजरने वाला नॉर्थ-वेस्ट पैसेज (उत्तर-पश्चिमी मार्ग) और उत्तरी ध्रुव के ऊपर से जाने वाला सेंट्रल आर्कटिक रूट भी भविष्य में अहम माने जा रहे हैं। इन रास्तों से यूरोप से एशिया की यात्रा का समय काफी कम हो सकता है और ये स्वेज नहर के विकल्प बन सकते हैं, जिससे वैश्विक शिपिंग पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
बढ़ती समुद्री आवाजाही और छिपे खतरे
आर्कटिक में समुद्री आवाजाही में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और साल 2025 में 'इस्तांबुल ब्रिज' नाम का एक कंटेनर जहाज चीन से ब्रिटेन तक नॉर्दर्न सी रूट से सिर्फ करीब 20 दिनों में पहुंच गया, जबकि पारंपरिक रास्तों से इसमें काफी अधिक समय लगता है। इसी तरह, 2024 में रूस और अमेरिका के बीच मौजूद बेरिंग स्ट्रेट से 665 जहाज गुजरे, जो 2010 के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र से जहाजों की आवाजाही तेजी से बढ़ी है। हालांकि, खतरे अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। कई बार गर्मियों में भी बर्फ अचानक जम जाती है और। जहाज उसमें फंस जाते हैं, जिससे बचाव अभियान चलाने पड़ते हैं। इसलिए, ये रास्ते फायदेमंद तो हैं, लेकिन अभी पूरी तरह सुरक्षित और विश्वसनीय नहीं माने जा सकते हैं और इन चुनौतियों के बावजूद, आर्थिक लाभ की संभावनाओं के कारण इन मार्गों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है।
आर्कटिक पर वैश्विक दावे और सैन्यीकरण
आर्कटिक इलाके को लेकर देशों के बीच तनाव भी लगातार बढ़ रहा है। कनाडा, डेनमार्क (ग्रीनलैंड के माध्यम से), नॉर्वे, रूस और अमेरिका सभी इस क्षेत्र पर अपने-अपने दावे रखते हैं, जो अक्सर एक-दूसरे से टकराते हैं। इसकी वजह साफ है: यहां नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और भविष्य में बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधन मिलने की उम्मीद है। अमेरिका की ग्रीनलैंड में पहले से सैन्य मौजूदगी है, जहां थुले एयर बेस (Thule Air। Base) नाम का एक सैन्य अड्डा मिसाइल वॉर्निंग और स्पेस सर्विलांस का काम करता है। रूस ने भी पिछले दस सालों में आर्कटिक में कई नए सैन्य ठिकाने खोले हैं और सोवियत दौर के पुराने अड्डों को फिर से सक्रिय किया है, जिससे उसकी सैन्य क्षमता में इजाफा हुआ है और 2018 में चीन ने खुद को 'नियर आर्कटिक कंट्री' घोषित किया, ताकि इस इलाके में अपना रोल बढ़ा सके और संसाधनों तक पहुंच बना सके। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पिछले 10 से 15 सालों में आर्कटिक में मिलिट्री गतिविधियां काफी बढ़ी हैं, और 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद हालात और भी बदल गए हैं और अब आर्कटिक सिर्फ बर्फ और ठंड का इलाका नहीं रहा, बल्कि दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच मुकाबले और रणनीति का एक नया मैदान बनता जा रहा है।
NATO विस्तार और आर्कटिक में बदलती सुरक्षा
फिनलैंड और स्वीडन के NATO में शामिल होने से आर्कटिक इलाके की सुरक्षा स्थिति में एक बड़ा बदलाव आया है। पहले ये दोनों देश NATO से बाहर थे, लेकिन अब उनके जुड़ने से NATO सीधे रूस की उत्तरी सीमा के और करीब पहुंच गया है। इससे रूस की चिंता बढ़ गई है और वह अपनी कोशिशें तेज कर रहा है कि वह कोला प्रायद्वीप और बैरेंट्स सागर जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अपना मजबूत नियंत्रण बनाए रखे और ये क्षेत्र रूस के लिए बहुत अहम हैं, क्योंकि यहां उसकी नौसेना और परमाणु क्षमता से जुड़े कई महत्वपूर्ण ठिकाने मौजूद हैं। यूक्रेन युद्ध में उलझे होने के बावजूद रूस ने आर्कटिक में अपनी सैन्य मौजूदगी कमजोर नहीं होने दी है, बल्कि इसे और मजबूत किया है। दूसरी तरफ, NATO देश भी पीछे नहीं हैं।
वे आर्कटिक में अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहे हैं और खास तौर पर नए आइसब्रेकर जहाज बनाने की घोषणाएं की जा रही हैं, ताकि बर्फीले समुद्रों में उनकी पहुंच बनी रहे। NATO के विस्तार के बाद डेनमार्क की वायुसेना अब नॉर्वे, फिनलैंड और स्वीडन के साथ पहले से ज्यादा मिलकर सैन्य अभ्यास और निगरानी कर रही है, जिससे इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों की उपस्थिति मजबूत हुई है। इस इलाके में चीन की दिलचस्पी भी बढ़ रही है, और साल 2024 में। चीन ने अपने तीन आइसब्रेकर जहाज आर्कटिक भेजे, जो उसकी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को दर्शाते हैं।
ग्रीनलैंड क्यों है रणनीतिक रूप से इतना अहम?
ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत को कई बिंदुओं से समझा जा सकता है। यह दुनिया के उत्तर में, आर्कटिक इलाके में स्थित है और भौगोलिक रूप से अमेरिका और यूरोप के बीच पड़ता है, जिससे इसकी जगह बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है और ग्रीनलैंड में अभी तक दुर्लभ खनिजों का बड़े पैमाने पर खनन नहीं हो पाया है, क्योंकि इसका लगभग 80% हिस्सा बर्फ से ढंका हुआ है और साल के ज्यादातर समय वहां पहुंचना बेहद दुर्गम होता है। सिर्फ लगभग 20% इलाका ही बर्फ से मुक्त है। लेकिन जैसे-जैसे जलवायु संकट की वजह से बर्फ पिघल रही है,। वैसे-वैसे जमीन के नीचे दबे नए खनिज संसाधन सामने आने लगे हैं।
इसी कारण दुनिया की बड़ी ताकतों की नजर ग्रीनलैंड और पूरे आर्कटिक इलाके पर लगातार टिकी हुई है। आने वाले समय में यह इलाका सिर्फ प्राकृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक तौर पर भी और ज्यादा अहम हो सकता है। ग्रीनलैंड में तेल, गैस और कई कीमती खनिज मिलने की प्रबल संभावना है, जिनकी भविष्य में वैश्विक जरूरत बढ़ेगी। यहां अमेरिका का एक सैन्य अड्डा है, जहां से मिसाइलों, अंतरिक्ष गतिविधियों और सुरक्षा से जुड़ी चीज़ों पर लगातार नजर रखी जाती है। अमेरिका, रूस और चीन जैसे बड़े देश ग्रीनलैंड और आसपास के इलाके में ज्यादा सक्रिय होना चाहते हैं, क्योंकि यह उनकी सुरक्षा और व्यापारिक हितों से सीधा जुड़ा है और इसके अलावा, ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और डेनमार्क NATO का सदस्य है, इसलिए पश्चिमी देशों के लिए भी यह इलाका सुरक्षा और गठबंधन के लिहाज से बेहद अहम है।
ग्रीनलैंड: एक परिचय
ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है, जहां लगभग 57 हजार लोग रहते हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 21 लाख वर्ग किलोमीटर है। ग्रीनलैंड का लगभग 85% भाग 1. 9 मील (3 किलोमीटर) मोटी बर्फ की चादर से ढका है, जिसमें दुनिया का लगभग 10% ताजा पानी मौजूद है। यह उत्तर अटलांटिक और आर्कटिक महासागर के बीच में स्थित है और वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट से जूझ रहा है। ग्रीनलैंड में नियोडायमियम, प्रासियोडायमियम, डिस्प्रोसियम, टर्बियम और यूरेनियम जैसे कई दुर्लभ खनिजों का विशाल भंडार है। ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों और अन्य उच्च-तकनीकी उद्योगों के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दुनिया में लगातार बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्रीनलैंड और आर्कटिक महाद्वीप की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे इस जगह का सामरिक और आर्थिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है। यहां खनन का काम कर रही कंपनियों में चीन की भी बड़ी हिस्सेदारी है, जो इस क्षेत्र में उसकी बढ़ती दिलचस्पी को दर्शाता है और यह पहली बार नहीं है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा जताई हो। इससे पहले 1946 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क से 10 करोड़ डॉलर में इस बर्फीले द्वीप को खरीदने की पेशकश की थी। ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में अमेरिकी वायुसेना का थुले एयर बेस है, जहां करीब 600 सैनिक तैनात हैं, जो इसकी रणनीतिक अहमियत को और बढ़ाता है।
भारत के लिए ग्रीनलैंड का महत्व
आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड, भारत के लिए भी कई मायनों में अहम है और आर्कटिक में हो रहे जलवायु बदलावों का सीधा असर भारतीय मानसून और हिमालयी ग्लेशियरों पर पड़ता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है। ग्रीनलैंड की विशाल बर्फीली चादर पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है और इसका असर भारत के तटीय इलाकों और मौसम के पैटर्न पर भी पड़ सकता है, जिससे बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ जाता है।
दूसरा बड़ा कारण विज्ञान और रिसर्च है। भारत 2007 से आर्कटिक में वैज्ञानिक शोध कर रहा है और नॉर्वे के। स्वालबर्ड क्षेत्र में भारत का ‘हिमाद्री’ रिसर्च स्टेशन सफलतापूर्वक काम कर रहा है। ग्रीनलैंड और आसपास के आर्कटिक क्षेत्रों से मिलने वाला डेटा भारतीय वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करता है कि आर्कटिक में बर्फ पिघलने का असर हिमालय और भारत की नदियों पर कैसे पड़ेगा, जिन पर देश की बड़ी आबादी अपनी आजीविका और जल सुरक्षा के लिए निर्भर करती है।
ग्रीनलैंड रणनीतिक और आर्थिक रूप से भी भारत के लिए अहम है। आर्कटिक में बर्फ कम होने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जो यूरोप और एशिया के बीच सफर का समय काफी घटा सकते हैं, जिससे भारतीय व्यापार को लाभ हो सकता है। इसके अलावा, ग्रीनलैंड में मौजूद दुर्लभ खनिज मोबाइल, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी हैं। भारत अपनी आर्कटिक नीति के तहत इन संसाधनों में टिकाऊ और नियमों के मुताबिक सहयोग और निवेश के मौके तलाश रहा है, ताकि अपनी बढ़ती तकनीकी जरूरतों को पूरा कर सके और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति मजबूत कर सके और यह क्षेत्र भारत के लिए न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान का केंद्र है, बल्कि भविष्य की ऊर्जा और खनिज सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।