भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दिल्ली में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस तीन दिवसीय आयोजन के दौरान दुनिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक कुशलता का लोहा माना। पीएम मोदी ने इस दौरान 15 वन-टू-वन द्विपक्षीय बैठकें कीं, जो वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहीं। सम्मेलन के अंत में 'नई दिल्ली घोषणापत्र' जारी किया गया, जिस पर सभी सदस्य देशों ने अपनी सहमति जताई। इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि भारत ने उन देशों को भी एक मंच पर लाने में सफलता हासिल की, जिनके बीच आपसी तनाव चरम पर है।
नई दिल्ली घोषणापत्र और वैश्विक सहमति
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का मुख्य आकर्षण 'नई दिल्ली घोषणापत्र' रहा। इस संयुक्त घोषणापत्र में सदस्य देशों ने अंतरराष्ट्रीय संघर्षों, व्यापार और वैश्विक शासन से जुड़े मुद्दों पर एक साझा रुख अपनाया। भारत के नेतृत्व में तैयार इस दस्तावेज में दुनिया की मौजूदा चुनौतियों का समाधान खोजने पर जोर दिया गया है। सभी देशों का एक सुर में इस घोषणापत्र पर सहमत होना भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। इसमें एकतरफा प्रतिबंधों और आर्थिक दबावों का विरोध करते हुए एक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की वकालत की गई है।
ईरान, यूएई और सऊदी अरब का एक साथ आना
भारत के लिए इस शिखर सम्मेलन की मेजबानी करना एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती थी। ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने के कुछ समय बाद ही पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया था, जिसमें ईरान, यूएई और सऊदी अरब जैसे देश शामिल थे। ये तीनों ही देश ब्रिक्स के सदस्य हैं। भारत ने अपनी सूझबूझ से इन तीनों धुर-विरोधी देशों को एक मंच पर बिठाया। पीएम मोदी ने इन देशों के प्रमुखों के साथ अलग-अलग बैठकें कीं और क्षेत्र में शांति बनाए रखने की अपील की। यह भारत की उस छवि को दर्शाता है जहाँ वह दुनिया के विवादों को सुलझाने में एक सेतु का काम कर रहा है।
मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात और संबंधों का 'रीसेट'
शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता पर पूरी दुनिया की नजर थी। साल 2020 में सीमा पर हुए तनाव के बाद शी जिनपिंग की यह यात्रा दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति, व्यापार और आपसी सहयोग बढ़ाने पर चर्चा की। चीन ने भी भारत की बढ़ती धाक को स्वीकार किया और कहा कि यह समय साथ मिलकर काम करने का है। इस मुलाकात को भारत-चीन संबंधों को 'रीसेट' करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
मोदी-पुतिन वार्ता और शांति की पहल
प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई मुलाकात में यूक्रेन संघर्ष और रणनीतिक सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। इस दौरान दोनों नेताओं की 'कार राइड' काफी चर्चा में रही, जिसने एक मजबूत राजनीतिक और प्रतीकात्मक संदेश दिया। पुतिन ने रूस-यूक्रेन के बीच शांति की पहल पर अपनी सहमति जताई, जो भारत के शांति प्रयासों की सफलता को दर्शाता है। दोनों देशों ने व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत करने और डॉलर के विकल्प तलाशने पर भी बात की।
आतंकवाद पर कड़ा प्रहार और पहलगाम हमले का जिक्र
ब्रिक्स सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ एक बहुत ही कड़ा संदेश दिया गया। घोषणापत्र में आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई और आतंकी फंडिंग व सुरक्षित पनाहगाहों को खत्म करने का आह्वान किया गया और भारत ने प्रमुखता से पहलगाम आतंकी हमले का मुद्दा उठाया, जिसे ब्रिक्स के साझा रुख में शामिल किया गया। सदस्य देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि आतंकवाद को पनाह देने वाले देशों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जाना चाहिए।
आर्थिक सुधार और डॉलर पर निर्भरता कम करना
सम्मेलन के आर्थिक एजेंडे में स्थानीय मुद्राओं में भुगतान को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया। ब्रिक्स देशों ने सीमा-पार लेनदेन के लिए अपनी-अपनी मुद्राओं के इस्तेमाल की वकालत की ताकि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम किया जा सके और इसके लिए एक वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम करने पर सहमति बनी। यह कदम ब्रिक्स देशों की आर्थिक संप्रभुता को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।
ग्लोबल साउथ और संयुक्त राष्ट्र में सुधार
भारत ने ब्रिक्स के मंच से 'ग्लोबल साउथ' यानी विकासशील देशों की आवाज को मजबूती से उठाया। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की अपनी दावेदारी को फिर से दोहराया और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। सम्मेलन में यह बात उभरकर आई कि वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़नी चाहिए ताकि वे दुनिया के फैसलों में बराबर के हिस्सेदार बन सकें।
भविष्य की तकनीक: एआई और डिजिटल खेती
ब्रिक्स देशों ने भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अन्य उभरती हुई तकनीकों में सहयोग करने का फैसला किया है। सम्मेलन में डिजिटल खेती, एमएसएमई (MSME) और युवाओं के कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया और छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने और कृषि क्षेत्र में तकनीक के इस्तेमाल को लेकर सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी।
ऊर्जा, जलवायु और चीन 2027 की मेजबानी
आर्थिक एजेंडे में ऊर्जा बदलाव, खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ विकास जैसे मुद्दों को भी प्राथमिकता दी गई। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए ब्रिक्स देशों ने मिलकर काम करने का संकल्प लिया। सम्मेलन के अंत में यह भी साफ हो गया कि चीन साल 2027 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। पीएम मोदी ने अपने समापन संबोधन में कहा कि ब्रिक्स केवल देशों का समूह नहीं है, बल्कि यह समाधान का एक इकोसिस्टम है जिससे पूरी दुनिया को उम्मीदें हैं।