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भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट: एमकैप 8% घटा, वैश्विक प्रदर्शन कमजोर

भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट: एमकैप 8% घटा, वैश्विक प्रदर्शन कमजोर
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वित्त वर्ष 2026 में भारतीय शेयर बाजार को एक बड़े झटके का सामना करना पड़ा है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की निरंतर बिकवाली और वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारतीय कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) में पिछले तीन वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। 5 ट्रिलियन के स्तर पर आ गया है। यह गिरावट वित्त वर्ष 2023 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है।

वैश्विक स्तर पर भारत का तुलनात्मक प्रदर्शन

वैश्विक बाजारों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस अवधि के दौरान दुनिया भर में केवल 13 बाजारों के मार्केट कैप में कमी आई है। भारत इन गिरावट वाले देशों की सूची में 9वें स्थान पर रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, सबसे अधिक गिरावट साइप्रस के बाजार में देखी गई, जहां मार्केट कैप 25% तक कम हो गया। इसके बाद लेबनान में 21%, डेनमार्क में 15% और अर्जेंटीना में 14% की गिरावट दर्ज की गई। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों के बाजारों में भी 1% से 3% के बीच मामूली कमी देखी गई है।

बाजार में गिरावट के प्रमुख उत्तरदायी कारक

बाजार विश्लेषकों ने भारतीय बाजार में आई इस कमजोरी के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया है। इसमें शेयरों का उच्च मूल्यांकन (High Valuation) और कंपनियों की आय में सुस्त वृद्धि प्रमुख कारण रहे हैं। इसके अतिरिक्त, ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक अनिश्चितता को जन्म दिया है। विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पूंजी निकालने और वैश्विक टैरिफ वार की स्थितियों ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया है और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियों को और बढ़ा दिया है।

विदेशी ब्रोकरेज फर्मों के संशोधित अनुमान

बाजार की वर्तमान स्थिति को देखते हुए प्रमुख वैश्विक ब्रोकरेज फर्मों ने भारत के विकास अनुमानों में कटौती की है। गोल्डमैन सैक्स ने अपने विकास अनुमान में लगभग 9% की कमी की है। इससे पहले कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए विकास दर 16% और 2027 के लिए 14% रहने का अनुमान लगाया गया था, जिसे अब घटा दिया गया है। ब्रोकरेज फर्म ने इस कटौती के पीछे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की धीमी रफ्तार और भारतीय रुपये की कमजोरी को मुख्य कारण बताया है।

कच्चे तेल की कीमतों का आर्थिक प्रभाव

कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता भारतीय बाजार के लिए एक बड़ा जोखिम बनी हुई है। एचएसबीसी (HSBC) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि भू-राजनीतिक संघर्ष लंबा चलता है, तो यह वित्त वर्ष 2027 के लिए अनुमानित 16% की विकास दर को प्रभावित कर सकता है। अनुमानों के मुताबिक, अप्रैल और मई के महीनों में कच्चा तेल $80-$100 प्रति बैरल के बीच रह सकता है। जून-जुलाई तक इसके $80 प्रति बैरल के स्तर पर आने की संभावना जताई गई है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से चालू खाता घाटा (CAD) और सब्सिडी का बोझ बढ़ने का खतरा रहता है।

अन्य वैश्विक बाजारों में सकारात्मक रुझान

भारतीय बाजार में गिरावट के विपरीत, दुनिया के कई अन्य बाजारों ने इस दौरान मजबूती का प्रदर्शन किया है। दक्षिण कोरिया के मार्केट कैप में रिकॉर्ड 118% का उछाल देखा गया, जो वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक है। ताइवान के मार्केट कैप में 68% की वृद्धि हुई, जबकि कनाडा में 28%, चीन में 25% और जापान में 24% की बढ़त दर्ज की गई। अमेरिका के बाजार में भी 17% की तेजी आई है। ताइवान और कनाडा के लिए यह वित्त वर्ष 2021 के बाद की सबसे बड़ी तेजी रही है।

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