दुनिया की भू-राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है जहां भारत के हितों की रक्षा के लिए यूरोपीय संघ के 27 देश एकजुट हो गए हैं। अमेरिका की मंशा थी कि भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए कड़े प्रतिबंध और भारी टैरिफ लगाए जाएं, लेकिन यूरोपीय संघ (EU) ने अमेरिका का साथ देने से साफ इनकार कर दिया है। इसके पीछे की मुख्य वजह भारत और यूरोप के बीच होने वाली एक ऐतिहासिक 'फ्री। ट्रेड डील' बताई जा रही है, जिसे यूरोप किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।
अमेरिका की योजना पर यूरोप का प्रहार
इस पूरे विवाद की जड़ में रूसी तेल है। यूक्रेन युद्ध के बाद से अमेरिका लगातार रूस की आर्थिक कमर तोड़ने की कोशिश कर रहा है। इसी कड़ी में अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए यूरोपीय देशों से अपील की थी कि वे भी भारत पर रूसी तेल आयात के लिए 'ज्वाइंट टैरिफ' लगाएं। हालांकि, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में खुलासा किया। कि उनके यूरोपीय सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। बेसेंट के अनुसार, यूरोप ने इसे 'नैतिकता' का हवाला देकर टाल दिया, लेकिन असल में उनकी प्राथमिकता भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना है।
ट्रेड डील के लिए झुका यूरोप
यूरोपीय संघ के लिए भारत एक बहुत बड़ा बाजार है। वर्तमान में भारत और ईयू के बीच एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत चल रही है और यह डील इतनी महत्वपूर्ण है कि यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन खुद भारत आकर इसे अंतिम रूप देने की तैयारी में हैं। यूरोप को पता है कि अगर उसने अमेरिका के कहने पर भारत पर प्रतिबंध लगाए, तो यह ऐतिहासिक डील खटाई में पड़ सकती है और यही कारण है कि 27 देशों ने अमेरिका की सुपरपावर वाली धौंस को दरकिनार कर भारत का पक्ष लिया।
अमेरिका का दोहरा रवैया और नाराजगी
स्कॉट बेसेंट ने यूरोप के इस रुख को 'विडंबना और मूर्खता' करार दिया है। अमेरिका का तर्क है कि यूरोप एक तरफ रूस के खिलाफ खड़ा होने का दावा करता है, लेकिन दूसरी तरफ वह भारत से वही तेल खरीद रहा है जो रूस से आता है। दरअसल, भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है और उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस करके पेट्रोल-डीजल के रूप में यूरोप को निर्यात करता है। अमेरिका का आरोप है कि यूरोप इस तरह परोक्ष रूप से रूस के युद्ध को वित्तपोषित कर रहा है।
भारत पर नरम पड़े अमेरिका के तेवर
यूरोप के असहयोग और भारत की मजबूत कूटनीति का असर अब दिखने लगा है और अमेरिका ने संकेत दिए हैं कि वह भारत पर लगाए गए 25% अतिरिक्त टैरिफ को हटा सकता है। बेसेंट ने स्वीकार किया कि 2025 में भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद में कमी आई है और रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों ने आयात कम किया है। इस सकारात्मक बदलाव को देखते हुए अमेरिका अब अपने कड़े रुख को लचीला बनाने पर विचार कर रहा है और हालांकि, अमेरिकी सीनेट में अभी भी 500% टैरिफ जैसे कड़े प्रस्ताव विचाराधीन हैं, लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति केवल राष्ट्रीय हितों से संचालित होगी।