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ईरान-अमेरिका तनाव: 60 फीसदी भारतीयों को सता रही रसोई गैस महंगी होने की चिंता

ईरान-अमेरिका तनाव: 60 फीसदी भारतीयों को सता रही रसोई गैस महंगी होने की चिंता
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ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार के माध्यम से भारतीय रसोई तक पहुंचता दिख रहा है। सी-वोटर द्वारा किए गए एक व्यापक 'वॉर सर्वे' के आंकड़ों के अनुसार, भारत की एक बड़ी आबादी युद्ध के कारण होने वाली आर्थिक अस्थिरता और विशेष रूप से रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में संभावित वृद्धि को लेकर गहरे तनाव में है। सर्वेक्षण के परिणाम बताते हैं कि लगभग 60% भारतीय नागरिक रसोई गैस के दाम बढ़ने की संभावना से चिंतित हैं, जबकि 82% लोगों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने से परिवहन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की लागत बढ़ जाएगी।

वैश्विक स्तर पर होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने एलपीजी और पेट्रोलियम की आपूर्ति श्रृंखला को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, ऐसे में पश्चिम एशिया में किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव सीधे तौर पर घरेलू कीमतों को प्रभावित करता है। सी-वोटर के इस सर्वेक्षण में देश के सभी राज्यों और जिलों के नागरिकों की राय शामिल की गई है, जो युद्ध के आर्थिक प्रभाव और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने वाले इसके असर को रेखांकित करती है।

ईंधन की कीमतों पर जनता की चिंता का स्तर

सर्वेक्षण के दौरान जब नागरिकों से पूछा गया कि क्या वे रसोई ईंधन के महंगा होने से चिंतित हैं, तो उत्तरदाताओं के बीच चिंता का स्तर काफी ऊंचा पाया गया। मार्च के चौथे सप्ताह के आंकड़ों के अनुसार, 27% लोगों ने स्वीकार किया कि वे इस स्थिति को लेकर 'बहुत ज्यादा चिंतित' हैं। वहीं, 29% उत्तरदाताओं ने कहा कि वे 'कुछ हद तक चिंतित' हैं। यदि इन दोनों श्रेणियों को मिला दिया जाए, तो आधे से अधिक आबादी कीमतों में वृद्धि के डर से जूझ रही है। इसके विपरीत, केवल 26% लोगों ने कहा कि उन्हें कीमतों को लेकर कोई चिंता नहीं है। मार्च के तीसरे सप्ताह की तुलना में चौथे सप्ताह में चिंता का ग्राफ थोड़ा बढ़ा है, जो वैश्विक परिस्थितियों के प्रति जनता की संवेदनशीलता को दर्शाता है।

एलपीजी कीमतों में संभावित वृद्धि का अनुमान

सर्वेक्षण में शामिल लोगों से जब कीमतों में संभावित वृद्धि के प्रतिशत के बारे में पूछा गया, तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। लगभग 34% उत्तरदाताओं का मानना है कि एलपीजी की कीमतों में 10-20% के बीच बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं, 26% लोगों ने आशंका जताई कि कीमतें 20 से 50% तक बढ़ सकती हैं। सबसे गंभीर चिंता उन 13% लोगों की है जो मानते हैं कि युद्ध की स्थिति में रसोई गैस के दाम दोगुने यानी 100% से भी अधिक हो सकते हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि आम जनता के मन में मुद्रास्फीति और ऊर्जा संकट को लेकर गहरा अविश्वास और भय व्याप्त है।

वैकल्पिक ईंधन स्रोतों की उपलब्धता और कमी

ऊर्जा संकट की स्थिति में वैकल्पिक संसाधनों की उपलब्धता पर भी सर्वेक्षण में महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। आंकड़ों के अनुसार, 50% भारतीयों के पास वर्तमान में रसोई में ईंधन का कोई वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध नहीं है। केवल 36% उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके पास एलपीजी के अलावा खाना बनाने के अन्य साधन मौजूद हैं। जब उन लोगों से पूछा गया जिनके पास विकल्प नहीं है, तो उनमें से 35% ने कहा कि वे भविष्य में वैकल्पिक स्रोत खरीदने की योजना बना रहे हैं। हालांकि, 45% लोगों ने अभी भी किसी भी प्रकार के वैकल्पिक निवेश से इनकार किया है, जो उनकी आर्थिक सीमाओं या स्थिति की प्रतीक्षा करने की रणनीति को दर्शाता है।

संकट की स्थिति में उपभोक्ताओं की संभावित रणनीति

यदि ईंधन की भारी कमी होती है या कीमतें पहुंच से बाहर हो जाती हैं, तो भारतीय परिवार किस प्रकार की रणनीति अपनाएंगे, इस पर भी सर्वेक्षण ने प्रकाश डाला है। लगभग 66% लोगों ने कहा कि वे ऐसी स्थिति में पारंपरिक ईंधन जैसे गोबर, चूल्हा और लकड़ी के इस्तेमाल की ओर वापस लौटेंगे। यह आंकड़ा ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ऊर्जा सुरक्षा के पारंपरिक तरीकों पर निर्भरता को स्पष्ट करता है। इसके अलावा, 16% लोगों ने इंडक्शन और इलेक्ट्रिक कुकर जैसे बिजली आधारित उपकरणों को अपनाने की बात कही है। वहीं, 8% लोगों ने कहा कि वे ईंधन बचाने के लिए गर्म भोजन का सेवन कम कर देंगे, जो संकट के समय जीवनशैली में आने वाले बड़े बदलाव का संकेत है।

सर्वेक्षण की कार्यप्रणाली और सांख्यिकीय विवरण

यह सर्वेक्षण सी-वोटर (C-VOTER) द्वारा स्नैप पोल के माध्यम से आयोजित किया गया था। इसमें मार्च के दूसरे, तीसरे और चौथे सप्ताह के दौरान डेटा एकत्र किया गया। सर्वेक्षण की पहुंच भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सभी जिलों तक थी, जहां टेलीफोनिक साक्षात्कार के जरिए लोगों की राय ली गई और सर्वेक्षण के परिणामों में +/- 5% का मार्जिन ऑफ एरर (त्रुटि की संभावना) रखा गया है। यह डेटा पूरी तरह से जनमत पर आधारित है और वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों के प्रति भारतीय नागरिकों के दृष्टिकोण को वस्तुनिष्ठ रूप से प्रस्तुत करता है।

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