इजराइल के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को चुनाव के दौरान एक बड़ा झटका लगता हुआ दिखाई दे रहा है। चुनाव की मतगणना के बीच सामने आए शुरुआती रुझानों और नतीजों ने पार्टी की राजनीतिक मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं। देश में डाले गए वोटों की गिनती का काम तेजी से चल रहा है और करीब 90 प्रतिशत वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है। इस स्तर पर सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को केवल 26 सीटें मिलने का अनुमान जताया जा रहा है। वोटों की गिनती का यह आंकड़ा राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी के लिए इसलिए भी बेहद अहम और चौंकाने वाला है, क्योंकि वर्ष 2009 के बाद से पार्टी को देश के किसी भी आम चुनाव में इतनी कम सीटें नहीं मिली थीं। हालांकि, जैसे-जैसे वोटों की गिनती आगे बढ़ेगी, अंतिम सीटों के आंकड़ों में कुछ फेरबदल या बदलाव देखने को मिल सकता है, लेकिन शुरुआती रुझानों को देखते हुए यह लगभग तय माना जा रहा है कि पार्टी का आंकड़ा पिछले सालों के मुकाबले काफी नीचे रहेगा।
इजराइल चुनाव और सरकार बनाने का गणित
इजराइल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव संपन्न हुए थे, जिसके तुरंत बाद 28 अक्टूबर से वोटों की गिनती शुरू हो गई और शुरुआती रुझान धीरे-धीरे सामने आने लगे। इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के नेतृत्व वाले राजनीतिक गठबंधन का मुकाबला पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबंधन के साथ है। इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं और देश में किसी भी दल या गठबंधन को अपनी सरकार बनाने के लिए न्यूनतम 61 सीटों की सख्त जरूरत होती है। शुरुआती रुझानों और अनुमानों को देखें तो इस बार किसी भी प्रमुख राजनीतिक गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात पर बहस तेज हो गई है कि क्या इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर कोई गहरा संकट मंडरा सकता है और क्या वे बहुमत का जादुई आंकड़ा छू पाने में सफल हो पाएंगे।
पिछले चुनावों के मुकाबले लिकुड पार्टी का कमजोर प्रदर्शन
शुरुआती रुझानों के बीच जहां एक तरफ अरब पार्टियों के प्रदर्शन ने राजनीतिक गलियारों और मीडिया में सुर्खियां बटोरनी शुरू कर दी थीं, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी का यह प्रदर्शन उनके राजनीतिक इतिहास के पिछले कई चुनावों के मुकाबले काफी कमजोर नजर आ रहा है। बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी लंबे समय से इजराइल की राजनीति की सबसे प्रमुख और ताकतवर धुरी रही है और पार्टी ने बीते वर्षों में कई महत्वपूर्ण चुनावों में बेहद शानदार प्रदर्शन किया है और नेतन्याहू ने भी देश की सत्ता पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखा है। लेकिन मौजूदा चुनाव के रुझान इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पार्टी को इस बार मतदाताओं से पहले जैसा व्यापक समर्थन और प्यार मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
विभिन्न वर्षों में लिकुड पार्टी का चुनावी सफर
यदि हम लिकुड पार्टी के पिछले चुनावी प्रदर्शनों पर गहरी नजर डालें, तो हमें उसकी राजनीतिक स्थिति में लगातार उतार-चढ़ाव और बदलाव देखने को मिलता है। साल 2009 के चुनाव में लिकुड पार्टी को कुल 27 सीटें प्राप्त हुई थीं। इसके बाद साल 2013 के चुनाव में पार्टी ने अपने प्रदर्शन में सुधार करते हुए बेहतर परिणाम हासिल किए और कुल 31 सीटें अपने नाम कीं। साल 2015 के चुनाव में लिकुड पार्टी को 30 सीटों पर संतोष करना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2019 का साल राजनीतिक रूप से बहुत व्यस्त रहा, क्योंकि उस वर्ष इजराइल में दो बार चुनाव आयोजित किए गए थे। अप्रैल 2019 के चुनाव में पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 35 सीटें जीतीं और एक मजबूत स्थिति दर्ज की, जबकि सितंबर 2019 के चुनाव में लिकुड पार्टी को 32 सीटें हासिल हुईं। इसके बाद साल 2020 का चुनाव पार्टी के लिए इस पूरी सूची में सबसे बेहतरीन साबित हुआ, जब पार्टी ने रिकॉर्ड 36 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। हालांकि, इसके बाद के वर्षों में गिरावट का दौर शुरू हुआ और साल 2021 के चुनाव में लिकुड पार्टी की सीटें घटकर सीधे 30 रह गईं। इसके बाद साल 2022 के चुनाव में पार्टी ने एक बार फिर हल्की वापसी की और कुल 32 सीटें हासिल करने में कामयाब रही। इन सभी पुराने आंकड़ों से यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि साल 2019 और 2020 के चुनावों में रिकॉर्ड तोड़ और मजबूत प्रदर्शन करने वाली लिकुड पार्टी को उसके बाद भी हमेशा 30 या उससे अधिक सीटें मिलती रही थीं। यही कारण है कि साल 2019 के बाद पहली बार पार्टी का आंकड़ा 30 सीटों से नीचे गिरना राजनीतिक रूप से एक बहुत बड़ा संकेत है।
नेतन्याहू के लिए सरकार गठन की राह आसान नहीं
लिकुड पार्टी की सीटों में आई इस भारी गिरावट का असर केवल पार्टी की आंतरिक स्थिति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा और गहरा प्रभाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गठबंधन और उनकी आगामी सरकार बनाने की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है और जैसा कि सर्वविदित है कि इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन को कम से कम 61 सीटों का समर्थन चाहिए होता है। करीब 90 प्रतिशत वोटों की गिनती पूरी होने के दौरान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों के गठबंधन को केवल 53 सीटें मिलने का शुरुआती अनुमान जताया गया है। वहीं दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी गठबंधन को इस चुनाव में 48 सीटें मिलने की मजबूत संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा, विभिन्न अरब पार्टियों को आपस में मिलाकर कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान भी सामने आया है। इस प्रकार, कोई भी प्रमुख गठबंधन बहुमत के जादुई आंकड़े से काफी पीछे दिखाई दे रहा है। इस जटिल स्थिति में सरकार के गठन के लिए अन्य छोटे दलों और क्षेत्रीय समूहों का समर्थन जुटाना बेहद जरूरी हो सकता है। यदि बेंजामिन नेतन्याहू अपने पारंपरिक सहयोगी दलों के साथ मिलकर भी आवश्यक बहुमत का आंकड़ा हासिल करने में असफल रहते हैं, तो उन्हें देश में सरकार चलाने के लिए एक नई और जटिल राजनीतिक रणनीति बनानी पड़ सकती है। हालांकि, इन सब के बावजूद लिकुड पार्टी का देश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना भी उसके राजनीतिक अस्तित्व के लिए बहुत अहम है।
क्या कम हो रही है प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लोकप्रियता?
लिकुड पार्टी की सीटों में आई इस भारी गिरावट को सीधे तौर पर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने खड़ी हो रही बढ़ती राजनीतिक चुनौतियों के रूप में देखा जा रहा है और इजराइल देश के भीतर सुरक्षा व्यवस्था, देश की अर्थव्यवस्था, सैन्य सेवा के नियम और सरकार के दैनिक कामकाज से जुड़े तमाम मुद्दे इस बार के चुनाव में सबसे बड़े और अहम केंद्र बिंदु रहे हैं। इन सभी ज्वलंत मुद्दों पर आम मतदाताओं की नाराजगी का सीधा असर सत्तारूढ़ गठबंधन और पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है। हालांकि, केवल सीटों की संख्या को देखकर यह पूरी तरह से तय नहीं किया जा सकता है कि इस गिरावट की एकमात्र और मुख्य वजह केवल बेंजामिन नेतन्याहू की लोकप्रियता में कमी है। किसी भी देश के चुनावी नतीजों पर वहां की जटिल गठबंधन की राजनीति, विपक्षी पार्टियों का आक्रामक प्रदर्शन और मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताओं का भी बहुत गहरा असर पड़ता है। फिलहाल राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि जब अंतिम और आधिकारिक चुनाव परिणाम सामने आएंगे, तब लिकुड पार्टी की सीटों की कुल संख्या कितनी होगी और क्या प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू देश में सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत का समर्थन जुटा पाने में कामयाब हो पाएंगे या नहीं। लेकिन इतना तो पूरी तरह से साफ हो चुका है कि साल 2009 के बाद यह पहली बार है जब शुरुआती अनुमानों में लिकुड पार्टी को 30 से कम सीटें मिलती दिख रही हैं, जो नेतन्याहू के लिए एक बहुत बड़ा राजनीतिक संकेत है।