जयपुर के झालाना क्षेत्र में जवाहर सर्किल से लेकर वर्ल्ड ट्रेड पार्क (WTP) तक फैली लगभग 900 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को लेकर उपजा विवाद एक बार फिर चर्चाओं में है। इस बेशकीमती जमीन के मालिकाना हक और इसके आवंटन की प्रक्रियाओं को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। सोशल मीडिया पर भी इस मामले को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं, जिनमें सरकारी जमीन के कथित आवंटन, रजिस्ट्री और समय के साथ किए गए बदलावों पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। यह पूरा मामला जवाहर लाल नेहरू मार्ग जैसे महत्वपूर्ण स्थान से जुड़ा होने के कारण प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर रहा है।
सोशल मीडिया पर उठते सवाल और गंभीर आरोप
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर साझा किए गए विभिन्न दस्तावेजों और नक्शों के माध्यम से यह दावा किया गया है कि यह जमीन मूल रूप से सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित की गई थी और आरोपों के अनुसार, बाद में इस भूमि से जुड़े आवंटन, स्वामित्व और रजिस्ट्री की प्रक्रिया में कई अनियमितताएं बरती गईं। इन पोस्ट्स में मांग की जा रही है कि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। सोशल मीडिया पर किए गए दावों में यह भी कहा गया है कि लगभग 900 करोड़ रुपये मूल्य की इस सरकारी जमीन को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश की गई और इस प्रक्रिया में कुछ अधिकारियों द्वारा नियमों के विपरीत जाकर स्वीकृतियां प्रदान की गईं। जमीन के आवंटन और उसके बाद की गई रजिस्ट्री में गंभीर खामियां होने की बात कही जा रही है।
वेलफेयर ट्रस्ट और एसीबी की जांच
इस बड़े विवाद के बीच वेलफेयर ट्रस्ट की जमीन का मामला भी सामने आया है और 10 जुलाई 2026 को प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, वेलफेयर ट्रस्ट की लगभग 5 करोड़ 25 लाख रुपये मूल्य की जमीन के कथित अवैध विक्रय को लेकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने रिपोर्ट मांगी है। इस मामले में एक चौंकाने वाला आरोप यह भी है कि जमीन की रजिस्ट्री कथित तौर पर फर्जी धर्म परिवर्तन के आधार पर कराई गई थी। एसीबी अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या इस रजिस्ट्री प्रक्रिया में किसी प्रकार की धोखाधड़ी या नियमों का उल्लंघन किया गया है। यह मामला मुख्य भूमि विवाद के साथ जुड़कर इसे और भी पेचीदा बना रहा है।
कंपनी के पंजीकरण और आवंटन तिथियों में विसंगति
इस पूरे प्रकरण में मीनाक्षी आर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (Meenakshi Arts Private Limited) नामक कंपनी का नाम भी सामने आया है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए स्क्रीनशॉट के अनुसार, इस कंपनी का पंजीकरण वर्ष 1997 में हुआ था। हालांकि, विवादित भूमि से जुड़े कुछ रिकॉर्ड्स में आवंटन की तिथियां वर्ष 1986 और 1988 दिखाई गई हैं। सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि जो कंपनी वर्ष 1997 में अस्तित्व में आई, उसके नाम पर वर्ष 1986 और 1988 के आवंटन कैसे दिखाए जा सकते हैं। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि ये रिकॉर्ड मूल आवंटन की तारीख को दर्शाते हैं, या फिर ये किसी पूर्व स्वामी के रिकॉर्ड, लीज ट्रांसफर या किसी अन्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इसकी वास्तविक स्थिति केवल सक्षम सरकारी जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।
नक्शों और ले-आउट प्लान के जरिए दावे
विवाद को पुख्ता करने के लिए सोशल मीडिया पर पुराने ले-आउट प्लान और गूगल मैप्स की तस्वीरें भी साझा की जा रही हैं। इन तस्वीरों में जवाहर लाल नेहरू मार्ग के किनारे स्थित एक बड़े भूभाग को चिन्हित किया गया है और दावा किया जा रहा है कि यही वह भूमि है जिस पर वर्तमान में विवाद चल रहा है और जिसकी स्थिति को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन नक्शों के माध्यम से यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि जमीन का मूल स्वरूप क्या था और वर्तमान में इसमें क्या बदलाव किए गए हैं।
हाईकोर्ट के निर्णय पर टिकी निगाहें
वर्तमान में यह पूरा मामला न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के अधीन है और राजस्थान हाईकोर्ट में इसकी नियमित सुनवाई हो रही है। यदि जांच एजेंसियां या संबंधित विभाग रिकॉर्ड की गहन जांच में किसी भी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार पाते हैं, तो इसमें शामिल दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। दूसरी ओर, यदि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पाई जाती हैं, तो संबंधित पक्षों को न्यायालय से राहत मिल सकती है। फिलहाल, इस 900 करोड़ रुपये की जमीन के भविष्य का फैसला हाईकोर्ट और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट पर निर्भर करता है।