केरल विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देते हुए उम्मीदवारों के चयन के लिए कड़े नियमों की घोषणा की है। पार्टी नेतृत्व ने इस बार जीत सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक मास्टरप्लान तैयार किया है, जिसके तहत प्रदर्शन और योग्यता को प्राथमिकता दी गई है। इस नई नीति का मुख्य उद्देश्य राज्य में सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाना और पार्टी के भीतर गुटबाजी को कम करना है और कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि पिछले चुनावों में खराब प्रदर्शन करने वाले नेताओं को इस बार चुनावी मैदान में नहीं उतारा जाएगा।
टिकट वितरण के लिए निर्धारित कड़े मानदंड
कांग्रेस के नए मास्टरप्लान के अनुसार, उन उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया जाएगा जो पिछले विधानसभा चुनाव में 5000 से अधिक मतों के अंतर से हार गए थे। इसके अतिरिक्त, पार्टी ने उन नेताओं को भी चुनावी दौड़ से बाहर रखने का निर्णय लिया है जो लगातार दो बार चुनाव हार चुके हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, इन कड़े नियमों का उद्देश्य नए और ऊर्जावान चेहरों को मौका देना है जो जनता के बीच बेहतर पकड़ रखते हैं और केंद्रीय स्क्रीनिंग कमेटी और केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) को निर्देश दिया गया है कि वे उम्मीदवारों के चयन के दौरान इन दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें।
सांसदों और मुख्यमंत्री पद के चयन पर नीति
पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है कि किसी भी वर्तमान सांसद को विधानसभा चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि, चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री के चयन की प्रक्रिया को लचीला रखा गया है और पार्टी के अनुसार, मुख्यमंत्री का चयन नवनिर्वाचित विधायकों की राय के आधार पर किया जाएगा। इस पद के लिए किसी विधायक या सांसद के नाम पर विचार किया जा सकता है, बशर्ते उसे बहुमत का समर्थन प्राप्त हो। यह कदम सांसदों को उनके वर्तमान क्षेत्रों में केंद्रित रखने और विधानसभा स्तर पर स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने के लिए उठाया गया है।
मजबूत उम्मीदवारों के लिए समायोजन की योजना
टिकट वितरण के दौरान होने वाले संभावित असंतोष को रोकने के लिए कांग्रेस ने एक विशेष 'इनाम' योजना तैयार की है। यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक मजबूत दावेदार हैं और उनमें से किसी को टिकट नहीं मिल पाता है, तो पार्टी ने उन्हें सरकार बनने की स्थिति में बोर्ड या निगमों में महत्वपूर्ण पदों पर समायोजित करने का आश्वासन दिया है। इसके विपरीत, पार्टी ने जवाबदेही तय करते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि जिस उम्मीदवार को टिकट दिया जाएगा और वह चुनाव हार जाता है, उसे सरकार में किसी भी पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा। यह नियम उम्मीदवारों पर जीत दर्ज करने का अतिरिक्त दबाव बनाने के लिए लागू किया गया है।
केरल की राजनीतिक पृष्ठभूमि और रणनीतिक बदलाव
केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के लिए यह चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य का पारंपरिक 'पांच साल में सरकार बदलने' का रिकॉर्ड टूट गया था और वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की थी और इस ऐतिहासिक बदलाव ने कांग्रेस को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। पार्टी इस बार किसी भी प्रकार की संगठनात्मक ढिलाई नहीं बरतना चाहती है, इसलिए उम्मीदवारों के चयन से लेकर सरकार गठन तक की प्रक्रिया को पहले ही स्पष्ट कर दिया गया है।
विपक्षी खेमे में हलचल और नए समीकरण
राज्य में चुनावी सरगर्मी के बीच अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं का कांग्रेस की ओर झुकाव भी देखा जा रहा है। हाल ही में कोट्टायम में आयोजित केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के 'संस्कार उत्सव 2026' में अभिनेता प्रेम कुमार की उपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा छेड़ दी है। प्रेम कुमार ने हाल ही में केरल चलचित्र अकादमी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने को लेकर राज्य सरकार की आलोचना की थी। इसी तरह, पलक्कड़ में माकपा के वरिष्ठ नेता अच्युतानंदन के पूर्व निजी सहायक सुरेश भी कांग्रेस की 'पुथुयुग यात्रा' में शामिल हुए हैं। इन घटनाओं को राज्य में बदलते राजनीतिक समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।