मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर है और इसी बीच अमेरिका को एक बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बाद अब सऊदी अरब ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए अपनी जमीन या हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति नहीं देगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी जंगी बेड़े और विमान वाहक पोत इस क्षेत्र में तैनात हो चुके हैं और ईरान के साथ सीधे टकराव की आशंका बनी हुई है।
सऊदी अरब और ईरान के बीच ऐतिहासिक बातचीत
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ फोन पर लंबी बातचीत की और इस बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर चर्चा की। क्राउन प्रिंस ने स्पष्ट रूप से कहा कि सऊदी अरब ईरान की संप्रभुता का पूरा सम्मान करता है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि किंगडम अपनी सीमाओं का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी हमले के लिए नहीं होने देगा। यह बयान अमेरिका की उन रणनीतियों के लिए एक बड़ी बाधा है, जो। ईरान को घेरने के लिए अरब देशों के सहयोग पर निर्भर रहती हैं।
ईरान ने जताया सऊदी अरब का आभार
ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने सऊदी अरब के इस स्टैंड की सराहना की है और उन्होंने कहा कि ईरान हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करता है और युद्ध को रोकने वाली हर प्रक्रिया का स्वागत करता है। पेजेश्कियन ने जोर देकर कहा कि अगर इस्लामिक देश एकजुट हो जाएं, तो क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है। उन्होंने क्राउन प्रिंस को धन्यवाद देते हुए कहा कि क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना ही भविष्य के संबंधों की बुनियाद है।
अमेरिका की सैन्य तैयारी और ट्रंप का रुख
दूसरी ओर, अमेरिका ने अपनी सैन्य उपस्थिति को मध्य पूर्व में काफी बढ़ा दिया है और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से हटाकर युद्धपोतों को ईरान के करीब तैनात किया गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिए हैं कि वे स्थिति पर करीब से नजर रख रहे हैं। हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा है कि शायद हमले की जरूरत न पड़े, लेकिन सैन्य विकल्प हमेशा मेज पर हैं। सऊदी अरब के इस इनकार के बाद अब अमेरिका को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता। है, क्योंकि बिना अरब देशों के सहयोग के ईरान पर बड़ा हमला करना सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होगा।
बदलते क्षेत्रीय समीकरण
विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब का यह कदम चीन की मध्यस्थता में हुए सऊदी-ईरान समझौते का परिणाम है। अब अरब देश अमेरिका की 'मैक्सिमम प्रेशर' नीति का हिस्सा बनने के बजाय अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं। वे नहीं चाहते कि ईरान के साथ किसी भी युद्ध की आग उनके अपने देशों तक पहुंचे। सऊदी अरब का यह फैसला न केवल अमेरिका के लिए झटका है, बल्कि। यह मध्य पूर्व में एक नए कूटनीतिक युग की शुरुआत का संकेत भी है।