प्रयागराज के माघ मेले में पिछले दस दिनों से जारी गतिरोध। अब एक भावुक और कड़े निर्णय के साथ समाप्त हो गया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने संगम नगरी से वापस लौटने का निर्णय लिया है। यह फैसला उन्होंने तब लिया जब प्रशासन के साथ उनकी मांगों पर कोई सहमति नहीं बन पाई। शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि वे अन्याय को स्वीकार नहीं करेंगे और अब न्याय का इंतजार करेंगे।
अपमान का कड़वा घूंट और प्रशासन की बेरुखी
विवाद की शुरुआत मौनी अमावस्या के पावन पर्व पर हुई थी। आरोप है कि उस दिन संगम स्नान के लिए जाते समय मेला पुलिस ने शंकराचार्य और उनके काफिले को रोक दिया था और इस दौरान पुलिस और शंकराचार्य के शिष्यों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का आरोप है कि पुलिस ने उनके शिष्यों और बटुकों के साथ न केवल अभद्रता की, बल्कि धक्का-मुक्की और मारपीट भी की और एक धर्मगुरु के लिए उनके शिष्यों का अपमान स्वयं के अपमान से बड़ा था, जिसके विरोध में वे पिछले 10 दिनों से अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठे थे।
प्रशासन का प्रस्ताव और शंकराचार्य का इनकार
धरने के दसवें दिन जब शंकराचार्य ने प्रयाग छोड़ने की घोषणा की, तब प्रशासन की नींद टूटी। आनंद-फानन में प्रशासन की ओर से एक लिखित प्रस्ताव भेजा गया। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि शंकराचार्य जब भी स्नान के लिए जाना चाहें, उन्हें पूरी राजकीय मर्यादा के साथ पालकी में ले जाया जाएगा। प्रस्ताव में यह भी वादा किया गया था कि जिले के वरिष्ठ अधिकारी स्वयं उनके स्वागत के लिए उपस्थित रहेंगे और उन पर पुष्प वर्षा की जाएगी।
हालांकि, शंकराचार्य ने इस भव्य प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि मुद्दा पुष्प वर्षा या पालकी का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रशासन के प्रस्ताव में उस घटना के लिए 'क्षमा' का कोई शब्द नहीं था, जो उनके शिष्यों के साथ घटी थी। उन्होंने दो टूक कहा कि अगर प्रशासन अपनी गलती के लिए सार्वजनिक रूप से। माफी नहीं मांग सकता, तो उन्हें किसी भी प्रकार का राजकीय सम्मान स्वीकार नहीं है।
बिना स्नान किए विदाई और भारी मन
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अत्यंत भावुक शब्दों में अपनी व्यथा व्यक्त की और उन्होंने कहा, 'आज स्वर बोझिल हैं और शब्द साथ नहीं दे रहे हैं। भारी मन लेकर प्रयाग से लौटना पड़ रहा है। प्रयाग में जो घटित हुआ उसने अंतरात्मा को झकझोर दिया है। ' उन्होंने आगे कहा कि वे बिना संगम स्नान किए ही यहां से विदा ले रहे हैं, जो एक सन्यासी के लिए अत्यंत कष्टकारी है और उनके अनुसार, न्याय की प्रतीक्षा कभी समाप्त नहीं होती, लेकिन आत्मसम्मान से समझौता करना उनके सिद्धांतों के खिलाफ है।
धर्म और प्रशासन के बीच बढ़ता फासला
यह घटना केवल एक स्नान विवाद नहीं है, बल्कि यह धर्मसत्ता और राजसत्ता के बीच बढ़ते तनाव को भी दर्शाती है और माघ मेले जैसे आयोजनों में संतों की गरिमा सर्वोपरि मानी जाती है। शंकराचार्य का बिना स्नान किए लौटना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उनके अनुयायियों में इस घटना को लेकर गहरा रोष है। स्वामी जी ने स्पष्ट किया कि वे अब इस मामले को न्याय की चौखट पर छोड़ रहे हैं और प्रयाग की स्मृतियों में इस कड़वाहट को लेकर वापस जा रहे हैं।
भविष्य की रणनीति और संदेश
प्रयागराज से रवानगी के समय शंकराचार्य के शिविर में सन्नाटा पसरा रहा। उन्होंने अपने शिष्यों को धैर्य रखने का संदेश दिया लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि संतों के सम्मान के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रशासन के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक विफलता मानी जा रही है, क्योंकि वे एक प्रतिष्ठित धर्मगुरु को मनाने में असफल रहे। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में इस विवाद का धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में क्या असर पड़ता है।