भारतीय क्रिकेट के प्रशासन से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामला एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है। इस बार अदालत ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) और विभिन्न राज्य क्रिकेट संघों के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा किया है, जो आने वाले समय में क्रिकेट प्रशासन की पूरी रूपरेखा बदल सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि जब देश में नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 लागू हो चुका है, तो फिर क्रिकेट की इन प्रभावशाली संस्थाओं को इसके दायरे से बाहर क्यों रखा जाना चाहिए?
चीफ जस्टिस की पीठ का कड़ा रुख
इस मामले की सुनवाई 9 सितंबर को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ द्वारा की गई। इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने कुछ क्रिकेट इकाइयों द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर विचार करते हुए विशेष रूप से बीसीसीआई और राज्य संघों के पदाधिकारियों की सेवा शर्तों और उनके कार्यकाल के नियमों पर ध्यान केंद्रित किया। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों के वकीलों से इस मुद्दे पर अपने मुवक्किलों से स्पष्ट निर्देश लेने को कहा है कि उनके पदाधिकारियों की सेवा की शर्तें 2025 के नए कानून के तहत क्यों नहीं आनी चाहिए।
2014 से जारी है कानूनी लड़ाई
बीसीसीआई के कामकाज और उसके ढांचे में सुधार को लेकर कानूनी प्रक्रिया काफी पुरानी है। दरअसल, बीसीसीआई से जुड़ा यह मामला नया नहीं है और इससे संबंधित एक मुख्य याचिका साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी। पिछले 10 वर्षों में इस मामले में समय-समय पर अलग-अलग आवेदन और याचिकाएं अदालत के सामने आती रही हैं। क्रिकेट प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का भी गठन किया था।
लोढ़ा समिति और प्रशासनिक सुधार
लोढ़ा समिति को बीसीसीआई के कामकाज के तरीके को सुधारने और बोर्ड के लिए एक नया संविधान तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में समिति की उन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था, जिनका मुख्य उद्देश्य बीसीसीआई के प्रशासन में बड़े बदलाव लाना था। इन सुधारों का असर यह हुआ कि बीसीसीआई को अपने पुराने ढर्रे को छोड़कर नए नियमों के अनुसार काम करना पड़ा। अदालत अब यह देखना चाहती है कि क्या नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 के आने के बाद इन नियमों में और अधिक एकरूपता लाने की आवश्यकता है।
कार्यकाल और कूलिंग ऑफ पीरियड के नियम
सितंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के संविधान में कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों को मंजूरी दी थी। इन संशोधनों के तहत किसी भी पदाधिकारी के कार्यकाल को लेकर स्पष्ट सीमाएं तय की गई थीं और नियमों के मुताबिक, कोई भी पदाधिकारी राज्य क्रिकेट संघ में 6 साल और बीसीसीआई में 6 साल के कार्यकाल के बाद, यानी कुल 12 साल तक लगातार पद पर रहने के बाद, तीन साल के अनिवार्य कूलिंग ऑफ पीरियड पर जाएगा। इसका मतलब है कि 12 साल के निरंतर सेवा काल के बाद उस व्यक्ति को तीन साल का ब्रेक लेना होगा।
मौजूदा नियमों के अनुसार, कोई भी पदाधिकारी बीसीसीआई और राज्य संघ के स्तर पर लगातार दो कार्यकाल पूरे कर सकता है। इसके बाद उसे तीन साल का अनिवार्य विश्राम लेना होता है, जिस दौरान वह किसी भी प्रशासनिक पद पर नहीं रह सकता। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट 2025 का जिक्र किए जाने के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या क्रिकेट बोर्ड को भी अन्य खेल संघों की तरह एक ही राष्ट्रीय कानून के तहत लाया जाएगा। अदालत ने वकीलों को इस संबंध में अपना पक्ष मजबूती से रखने और आवश्यक निर्देश प्राप्त करने के लिए समय दिया है।