अमेरिका एक अभूतपूर्व संकट के मुहाने पर खड़ा है, जहां उसे अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों रूस और चीन से पहले, अपने ही 31 नाटो सहयोगियों के साथ संभावित सैन्य संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है। वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर महत्वाकांक्षाएं देश को एक ऐसे युद्ध में धकेल सकती हैं, जिसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। यह स्थिति नाटो के मूल सिद्धांतों और वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को चुनौती दे रही है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हलचल मची हुई है।
ग्रीनलैंड विवाद और ट्रंप का अल्टीमेटम
इस पूरे विवाद की जड़ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को खरीदने या हथियाने की इच्छा है। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने ग्रीनलैंड को 20 दिनों का अल्टीमेटम दिया है, और शीर्ष रक्षा बैठकों में उन्होंने। यहां तक कह दिया है कि वे ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए सैन्य बल का उपयोग कर सकते हैं। यह बयान अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से नाटो के सदस्य देशों के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। ग्रीनलैंड, डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है, और उस पर किसी भी प्रकार का अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप डेनमार्क की संप्रभुता का सीधा उल्लंघन होगा, जिससे नाटो गठबंधन के भीतर गंभीर दरारें पड़ सकती हैं।
नाटो: एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान चुनौती
नाटो, या उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन, का गठन 1949 में शीतयुद्ध के दौरान हुआ था। इसका प्राथमिक उद्देश्य सोवियत संघ (तत्कालीन रूस) के बढ़ते दबदबे और साम्यवादी विस्तारवाद को रोकना था। अमेरिका ने ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों के साथ मिलकर इस सैन्य गठबंधन। की नींव रखी थी, जिसे दुनिया का सबसे मजबूत सैन्य संगठन माना जाता है। नाटो का सिद्धांत 'एक सबके लिए, सब एक के लिए' पर आधारित है, जिसका। अर्थ है कि किसी भी सदस्य देश पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। विडंबना यह है कि अब यही शक्तिशाली संगठन अमेरिका के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गया है,। क्योंकि ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर महत्वाकांक्षाएं नाटो के मूल सिद्धांतों के साथ सीधे टकरा रही हैं।
अनुच्छेद 5 का उल्लंघन और गंभीर परिणाम
अमेरिकी आउटलेट एक्सियोस के अनुसार, गुरुवार (8 जनवरी) को वाशिंगटन में डेमोक्रेट्स सांसदों की एक बैठक हुई। इस बैठक में सांसद जेफ्रीज ने मैकगवर्न के युद्ध शक्तियों से संबंधित प्रस्ताव के बारे में योजनाओं का पूर्वावलोकन प्रस्तुत किया। जेफ्रीज ने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिका डेनमार्क के क्षेत्र ग्रीनलैंड में घुसपैठ करता है, तो इसे नाटो चार्टर के अनुच्छेद-5 का सीधा उल्लंघन माना जाएगा और नाटो का अनुच्छेद 5 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो कहता है कि यूरोप या उत्तरी अमेरिका में नाटो के किसी एक या अधिक सदस्य देश पर होने वाला कोई भी सशस्त्र हमला उन सभी के खिलाफ हमला माना जाएगा। इस स्थिति में, नाटो के सदस्य देश सामूहिक रक्षा के तहत सैन्य। और हथियारों का उपयोग करके हमलावर का मुकाबला करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा
जेफ्रीज के विश्लेषण के अनुसार, यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर सैन्य कार्रवाई करता है और नाटो के अनुच्छेद 5 का उल्लंघन होता है, तो नाटो के अन्य सदस्य देश अमेरिका पर हमला कर सकते हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत मानी जाएगी, जिसके वैश्विक परिणाम भयावह हो सकते हैं। इस गंभीर खतरे को देखते हुए, नाटो से जुड़े अधिकांश देशों ने पहले ही डेनमार्क के पक्ष में अमेरिका को चेतावनी जारी कर दी है और डेनमार्क ने तो यहां तक कह दिया है कि ग्रीनलैंड पर कोई भी हमला नाटो के अस्तित्व को ही समाप्त कर सकता है, जो इस मुद्दे की संवेदनशीलता को दर्शाता है। यदि राष्ट्रपति ट्रंप ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अपनी जिद पर अड़े रहते हैं, तो उन्हें जनवरी के अंत तक नाटो के सदस्य देशों के साथ सीधे टकराव का सामना करना पड़ सकता है।
नाटो के साथ संभावित संघर्ष अमेरिका के लिए कई गंभीर कूटनीतिक और सैन्य चुनौतियां खड़ी करेगा। नाटो में शामिल अधिकांश देश यूरोप के हैं, जिनमें ब्रिटेन। और फ्रांस जैसे परमाणु हथियार संपन्न देश भी शामिल हैं। यदि अमेरिका इन प्रमुख सहयोगियों का साथ खो देता है, तो वह वैश्विक मंच पर काफी कमजोर पड़ जाएगा और ऐसे में, पहले से ही उसके विरोधी माने जाने वाले चीन और रूस जैसे परमाणु हथियार संपन्न देशों के खिलाफ उसकी स्थिति और भी नाजुक हो जाएगी। कूटनीतिक तौर पर भी यह अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका होगा, क्योंकि नाटो के मजबूत गठबंधन के बूते ही अमेरिका यूरोप और मध्य पूर्व में अपना दबदबा कायम रखे हुए है और इस गठबंधन के टूटने या कमजोर पड़ने से अमेरिका की वैश्विक शक्ति और प्रभाव में भारी गिरावट आ सकती है।
दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य संगठन नाटो
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की अस्थिरता और शीतयुद्ध के बढ़ते खतरों के बीच, सोवियत संघ और अमेरिका दोनों ही अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में लगे थे। यूरोपीय देशों ने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन का निर्माण किया और नाटो के संविधान के अनुसार, यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो सभी सदस्य मिलकर उसका मुकाबला करेंगे। वर्तमान में नाटो में कुल 32 देश शामिल हैं, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे प्रमुख सैन्य और आर्थिक शक्तियां शामिल हैं और इस संगठन की सामूहिक शक्ति और एकजुटता ही इसे दुनिया का सबसे बड़ा और प्रभावी सैन्य गठबंधन बनाती है।