भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर आंतरिक मतभेदों की मीडिया रिपोर्टों के सामने आने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने देश के शीर्ष चुनावी नेतृत्व पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कथित तौर पर वोट चोरी में शामिल लोगों को स्पष्ट रूप से देशद्रोही करार दिया है। यह विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जिनके खिलाफ अब विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। मीडिया रिपोर्टों से यह संकेत मिले हैं कि आयोग के भीतर कामकाज के तरीकों को लेकर गंभीर असंतोष है।
आंतरिक मतभेद और गंभीर आरोप
मीडिया रिपोर्ट्स की जांच से यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है कि चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में हो रहे कामकाज पर सवाल उठाए थे और बताया जा रहा है कि इन दोनों आयुक्तों ने वोटर लिस्ट के डेटा मैनेजमेंट और कामकाज की शैलियों को लेकर 14 अलग-अलग मौकों पर औपचारिक रूप से अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आंतरिक मतभेदों के उजागर होने के बाद विपक्ष ने इसे चुनावी निष्पक्षता पर बड़ा खतरा माना है और सीईसी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
महाभियोग प्रस्ताव की तैयारी
इस विवाद के गहराने के बाद विपक्ष ने संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने का निर्णय लिया है। सूत्रों के अनुसार, कानूनी विशेषज्ञों की सहायता से महाभियोग प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया जा रहा है। संयुक्त विपक्ष की ओर से जल्द ही दोनों सदनों में इस संबंध में औपचारिक नोटिस सौंपा जा सकता है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए आने वाले समय में मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं।
सीईसी पद की अहमियत और निर्णय प्रक्रिया
भारत निर्वाचन आयोग एक तीन सदस्यीय निकाय है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त का पद सबसे महत्वपूर्ण होता है। आयोग में दो अन्य चुनाव आयुक्त भी होते हैं। नियम के अनुसार, आयोग का कोई भी बड़ा फैसला या सहमति तीनों आयुक्तों की मर्जी से ली जानी चाहिए। इसका अर्थ है कि फैसले सर्वसम्मति से लिए जाने का प्रावधान है और हालांकि, 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज होने की बात सामने आने से यह स्पष्ट होता है कि आयोग के भीतर सर्वसम्मति का अभाव रहा है। इसी आधार पर विपक्ष अब ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग कर रहा है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नियम
देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग की मुख्य जिम्मेदारी है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं और 2023 के नए कानून के मुताबिक, इस पद के लिए केवल उन्हीं व्यक्तियों को चुना जा सकता है जिनके पास सरकार में सचिव स्तर (सेक्रेटरी-लेवल) के पदों पर कार्य करने का अनुभव हो। इसके अलावा, उनका ईमानदार होना और चुनाव प्रबंधन व संचालन का गहरा ज्ञान होना अनिवार्य है। इन आयुक्तों का कार्यकाल 6 साल या 65 साल की उम्र तक होता है, जो भी पहले पूरा हो। मुख्य चुनाव आयुक्त को वही वेतन और सुविधाएं मिलती हैं जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को दी जाती हैं।
सीईसी को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) में मुख्य चुनाव आयुक्त की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें हटाने की एक बहुत ही कठिन और विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इस अनुच्छेद के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे कि उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है। इस प्रावधान को 2023 के अधिनियम की धारा 11(2) में भी दोहराया गया है। उन्हें केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। कदाचार का अर्थ पद का दुरुपयोग या भ्रष्टाचार हो सकता है, जबकि अक्षमता का अर्थ कर्तव्यों के पालन में असमर्थता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना किसी अन्य चुनाव आयुक्त को नहीं हटाया जा सकता।
संसद में महाभियोग की प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए संसद के सदस्यों को एक प्रस्ताव का नोटिस लाना होता है, जिसे महाभियोग प्रस्ताव कहा जाता है। इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो आरोपों की जांच की जाती है। इसके बाद, इस प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित करना होता है। प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति उन्हें हटाने का आदेश जारी करते हैं। संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति संसद की सलाह मानने के लिए बाध्य होते हैं।
पूर्व में खारिज हुआ था प्रस्ताव
उल्लेखनीय है कि इसी साल अप्रैल में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष द्वारा पेश किए गए महाभियोग प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। 12 मार्च को ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने यह प्रस्ताव पेश किया था। उस समय लोकसभा के प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा के प्रस्ताव पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। उस दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपाती व्यवहार और चुनाव में धोखाधड़ी की जांच में बाधा डालने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। अब एक बार फिर विपक्ष नए सिरे से इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।
