अंतरराष्ट्रीय बाजार में तांबे यानी कॉपर की कीमतें अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं और तांबे का भाव 14,000 डॉलर प्रति टन के आंकड़े को पार कर गया है। हाल ही में वीकेंड पर इसके दाम 14,240 डॉलर प्रति टन पर बंद हुए। अमेरिका द्वारा तांबे पर भारी टैरिफ लगाने की आशंका के चलते कीमतों में यह बड़ा उछाल देखा गया है। हालांकि अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि अमेरिका अपने इस फैसले पर पुनर्विचार कर रहा है, लेकिन इसका असर भारतीय बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। भारत के ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंस्ट्रक्शन, टेलीकॉम से लेकर कृषि सेक्टर तक पर इसका भारी प्रभाव पड़ रहा है और उद्योग जगत अब इस कशमकश में है कि लागत का कितना हिस्सा वे खुद वहन करें और कितना बोझ ग्राहकों की जेब पर डाला जाए।
इलेक्ट्रिक वाहनों पर सबसे गहरा असर
तांबे की कीमतों में हुई इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा और सीधा असर इलेक्ट्रिक वाहनों यानी ईवी की लागत पर पड़ रहा है। एक सामान्य पेट्रोल या डीजल कार में करीब 20 से 25 किलो तांबे का इस्तेमाल होता है, जबकि एक इलेक्ट्रिक कार को बनाने में 80 से 85 किलो तांबा लगता है। वहीं अगर एक इलेक्ट्रिक बस की बात करें तो उसमें 250 से 300 किलो तक तांबे की जरूरत होती है। इस भारी अंतर की वजह से एक पेट्रोल या डीजल कार की लागत में 5,000 से 10,000 रुपये का इजाफा हो सकता है। वहीं एक इलेक्ट्रिक कार की कीमत 30,000 से 40,000 रुपये से भी ज्यादा बढ़ सकती है। इलेक्ट्रिक बस बनाने का खर्च तो 1 लाख रुपये से लेकर 1 लाख 50,000 रुपये तक बढ़ जाएगा।
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, तांबा महंगा होने से मारुति सुजुकी पर हर महीने 204 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इसी तरह टाटा मोटर्स पर 171 करोड़ रुपये, जबकि महिंद्रा पर 110 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ आने की आशंका जताई गई है। यह आंकड़े बताते हैं कि ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए अपनी लागत को नियंत्रित करना कितना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
घर के बजट पर पड़ेगा सीधा असर
तांबे का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जाता है। कीमतों में आए इस उछाल के चलते डेढ़ टन क्षमता वाले स्प्लिट एसी की लागत 2,000 से 4,000 रुपये तक बढ़ जाएगी। इसी तरह डबल-डोर फ्रिज की कीमत में भी 1,000 से 2,000 रुपये तक का इजाफा हो सकता है। कोडक और थॉमसन जैसे बड़े ब्रांड्स की मैन्युफैक्चरिंग करने वाली कंपनी एसपीपीएल के सीईओ अवनीश सिंह मारवाह ने जानकारी दी है कि वे इस महीने कीमतों में 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर रहे हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि अगली तिमाही में एक और बढ़ोतरी की जा सकती है। इसी तरह हायर अप्लायंसेज भी अक्टूबर के महीने में कीमतों में मामूली बढ़ोतरी करने की तैयारी में है। उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियों पर अपने मार्जिन को बचाने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
खेती और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में भी बढ़ी मुश्किलें
कृषि सेक्टर में भी तांबे की इस महंगाई का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। फलों को सड़ने से बचाने और विभिन्न बीमारियों से सुरक्षा के लिए कॉपर सल्फेट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इसकी कीमत में भी भारी तेजी आई है और यह 6 गुना तक महंगा हो गया है। इससे किसानों की खेती की लागत काफी बढ़ जाएगी। कंस्ट्रक्शन सेक्टर की बात करें तो अप्रैल से सितंबर के बीच तांबे के दाम 12 प्रतिशत तक बढ़े हैं। इसके कारण ट्रांसफार्मर, मोटर और लिफ्ट जैसे जरूरी उपकरणों की लागत लगातार बढ़ रही है। हालांकि कुछ कंपनियां इस स्थिति से राहत पाने के लिए तांबे की जगह एल्युमिनियम का इस्तेमाल करने पर विचार कर रही हैं। सोलर मॉड्यूल बनाने वाली कई कंपनियों ने अपने कुछ कंपोनेंट्स को तांबे से हटाकर एल्युमिनियम पर शिफ्ट कर दिया है।
डिस्ट्रीब्यूटर्स की चिंता और त्योहारी सीजन
बाजार के डिस्ट्रीब्यूटर्स को भी अब भविष्य का डर सताने लगा है और उनका मानना है कि कंपनियां अपनी बढ़ती लागत का हवाला देकर उनके कमीशन या मार्जिन में कटौती कर सकती हैं। ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन यानी एआईसीपीडीएफ ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई है कि उनका मार्जिन पहले से ही काफी दबाव में है और इस पूरी स्थिति में सबसे बड़ी परेशानी आम ग्राहकों के लिए खड़ी हो रही है। आने वाले त्योहारी सीजन में अगर आप टीवी, फ्रिज, एसी या कोई गाड़ी खरीदने का मन बना रहे हैं, तो आपको पहले के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। कंपनियों के पास फिलहाल दो ही रास्ते बचे हैं- या तो वे अपने मुनाफे को कम करें या फिर बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ ग्राहकों से वसूलें।
