उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए अब लगभग छह महीने का समय शेष रह गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। बीजेपी संगठन के बड़े नेताओं के लगातार यूपी दौरे और बैठकों का दौर चल रहा है और हाल ही में संगठन महासचिव बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े की अगुवाई में बैक-टू-बैक बैठकें हुईं, लेकिन इन बैठकों से जो फीडबैक निकलकर सामने आया है, उसने बीजेपी की टेंशन बढ़ा दी है। पार्टी के सामने कई ऐसे मोर्चे खुल गए हैं जहां उसे कड़ी मेहनत करने की जरूरत है।
धर्म से जाति की तरफ बढ़ रहा चुनाव
यूपी की सियासत में पिछले कई चुनावों में हिंदुत्व बीजेपी का बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है, लेकिन इस बार बीजेपी के अंदर से जो फीडबैक सामने आया है, उसमें चिंता जातीय राजनीति के बढ़ते असर को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक, संगठन की बैठकों में इस बात पर चर्चा हुई कि यूपी का मौजूदा माहौल धीरे-धीरे जातीय समीकरणों की तरफ जाता दिखाई दे रहा है और अगर चुनाव का नैरेटिव पूरी तरह जाति पर शिफ्ट हुआ, तो बीजेपी के सामने चुनौती बढ़ सकती है। पार्टी को डर है कि जाति आधारित ध्रुवीकरण उसके व्यापक हिंदू वोट बैंक में सेंध लगा सकता है।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी बनी चिंता
बीजेपी के लिए सबसे अहम उसका संगठन और बूथ स्तर का कार्यकर्ता है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक बैठक में कार्यकर्ताओं की नाराजगी को लेकर भी फीडबैक मिला। शिकायत है कि कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान नहीं मिल रहा है और उनकी बातों की सुनवाई नहीं हो रही है। 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान भी बीजेपी को लेकर कार्यकर्ताओं की नाराजगी की चर्चा सामने आई थी। अब 2027 से पहले संगठन नहीं चाहता कि वही स्थिति दोबारा पैदा हो। कार्यकर्ताओं और सरकार के बीच तालमेल की कमी को एक बड़ी समस्या के रूप में देखा जा रहा है।
विधायकों से नाराजगी कितनी बड़ी?
एक और बड़ा फीडबैक बीजेपी विधायकों को लेकर सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक कई इलाकों में स्थानीय विधायकों के खिलाफ जनता में भारी नाराजगी है और इसका असर ग्राउंड पर भी दिखाई दे रहा है। यानी बीजेपी को सिर्फ विपक्ष से नहीं बल्कि अपने ही विधायकों के खिलाफ संभावित एंटी-इनकंबेंसी से भी निपटना होगा। बताया जा रहा है कि बीजेपी ने एक सर्वे भी कराया है, जिसमें उसके 100 से अधिक विधायकों के खिलाफ भयंकर एंटी-इनकंबेंसी पाई गई है। ऐसे में टिकट वितरण के समय पार्टी को कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।
नई टीम पर भी सवाल
संगठन की नई टीम को लेकर भी अंदरखाने सवाल उठाए गए हैं और सूत्रों के मुताबिक चुनाव को देखते हुए संगठन में जो नए चेहरे आए हैं, उनमें से कुछ को लेकर ग्राउंड पर बहुत सकारात्मक फीडबैक नहीं है। कुछ नियुक्तियों को लेकर सिफारिश और चयन प्रक्रिया पर भी सवाल उठने की बात सामने आई है। हालांकि बीजेपी नेतृत्व की कोशिश यही है कि नई टीम को चुनावी मिशन में पूरी तरह सक्रिय किया जाए, क्योंकि चुनाव करीब है और प्रयोग के लिए वक्त बहुत कम बचा है।
बीजेपी खुद को कहां देख रही है?
अंदरखाने की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सूत्रों के मुताबिक बीजेपी इस समय चुनाव को एकतरफा बढ़त वाला मुकाबला नहीं मान रही है। बल्कि संगठन के स्तर पर फीडबैक है कि मुकाबला फिलहाल बराबरी का दिखाई दे रहा है। यानी बीजेपी खुद को न बहुत आगे मान रही है और न बहुत पीछे, लेकिन यही बराबरी बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है और अगले छह महीनों में अगर विपक्ष ने अपना नैरेटिव और मजबूत कर लिया तो मुकाबला और कड़ा हो सकता है।
सोशल मीडिया बना बड़ा मोर्चा
बीजेपी के सामने एक और बड़ी चुनौती सोशल मीडिया को लेकर है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी और सरकार को मिलकर विपक्ष के सोशल मीडिया नैरेटिव का जवाब देना होगा। आज चुनाव सिर्फ रैलियों और पोस्टरों से नहीं लड़ा जाता बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ा जाता है। विपक्ष अगर सोशल मीडिया पर नैरेटिव सेट करने में आगे निकल गया तो उसका असर युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं तक पहुंच सकता है। पार्टी आलाकमान ने अपनी मीडिया टीम को पूरी तरह से अटैकिंग मोड में रहने का निर्देश दिया है।
युवाओं और बेरोजगारी पर भी फोकस
युवाओं और रोजगार का मुद्दा भी बीजेपी की रणनीति के केंद्र में है। सूत्रों के मुताबिक सरकार को इस मोर्चे पर कुछ सकारात्मक बदलाव और ठोस संदेश देने की जरूरत महसूस की जा रही है और यूपी में एक बड़ी युवा आबादी है और चुनाव में बेरोजगारी, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मुद्दे विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बन सकते हैं। बीजेपी चाहती है कि चुनावी मैदान में जाने से पहले इन मुद्दों पर सरकार की उपलब्धियां और आगे की योजना दोनों जनता के सामने स्पष्ट रूप से दिखाई दें।
बसपा के आंतरिक कलह को लेकर भी टेंशन
हाल के दिनों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के अंदर जो चल रहा है, उसने भी बीजेपी की टेंशन बढ़ा दी है और आंकड़े बताते हैं कि जैसे ही बसपा का ग्राफ नीचे जाता है, उसका फायदा बीजेपी से ज्यादा सपा और कांग्रेस गठबंधन को होता है। 2024 के चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत दहाई का आंकड़ा नहीं पार कर पाया और इसका सीधा नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ा। ऐसे में बीजेपी के अंदर दलित वोटों को अपने पाले में लाने के साथ ही उसके बिखराव को रोकने को लेकर गहरा मंथन चल रहा है।
बीएल संतोष के तीन दिन और बढ़ी हलचल
बीएल संतोष का यूपी दौरा इसी लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। तीन दिनों तक संगठन के नेताओं और पदाधिकारियों के साथ बैठकों में ग्राउंड फीडबैक, कार्यकर्ताओं की स्थिति, विधायकों का प्रदर्शन और चुनावी तैयारी जैसे हर मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। सूत्रों के मुताबिक इस दौरे के बाद बीएल संतोष यूपी की मौजूदा स्थिति की पूरी रिपोर्ट केंद्रीय नेतृत्व को सौंप सकते हैं। इसके बाद बीजेपी में आगे की चुनावी रणनीति पर नए सिरे से काम शुरू हो सकता है। उन्होंने संगठन को एकजुट होकर और सरकार के साथ बेहतर तालमेल बनाकर चुनाव लड़ने का कड़ा संदेश दिया है।
