टाटा संस की लिस्टिंग होना तय: आरबीआई ने रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी खारिज की

आरबीआई ने टाटा संस की पंजीकरण सरेंडर करने की अर्जी ठुकरा दी है, जिससे अब कंपनी की पब्लिक लिस्टिंग का रास्ता साफ हो गया है। कंपनी की संपत्ति 2 लाख 1 हजार करोड़ रुपये है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने टाटा संस की उस अर्जी को आधिकारिक तौर पर खारिज कर दिया है जिसमें कंपनी ने अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट स्वेच्छा से सरेंडर करने की मांग की थी। टाटा संस ने खुद को एक अन-रजिस्टर्ड कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) के रूप में वर्गीकृत करने का अनुरोध किया था ताकि वह पब्लिक लिस्टिंग की अनिवार्य शर्त से बच सके। हालांकि, केंद्रीय बैंक के इस फैसले ने अब भारत के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप की होल्डिंग कंपनी के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होने का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया है। ईटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, 11 सितंबर 2026 को लिखे गए एक पत्र में आरबीआई ने स्पष्ट किया कि टाटा संस की 28 मार्च 2024 की अर्जी और उसके बाद हुए विचार-विमर्श के बाद, वह रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट को स्वेच्छा से सरेंडर करने की मांग को मंजूरी नहीं दे सकता है।

आरबीआई ने दिए कड़े निर्देश

रिजर्व बैंक ने टाटा संस को सलाह दी है कि वह एनबीएफसी-अपर लेयर (यूएल) कंपनियों पर लागू होने वाले सभी दिशा-निर्देशों और निर्देशों का पूरी तरह से पालन करने के लिए आवश्यक कदम उठाए। इस घटनाक्रम का सीधा मतलब यह है कि टाटा संस पर एनबीएफसी-यूएल कंपनियों के लिए निर्धारित रेगुलेटरी फ्रेमवर्क लागू रहेगा। आरबीआई के इस निर्देश ने उस महत्वपूर्ण नियामक रास्ते को बंद कर दिया है जिसे टाटा संस ने पब्लिक लिस्टिंग से बचने के लिए अपनाने की कोशिश की थी और कंपनी ने मार्च 2024 में अपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआईसी) के रजिस्ट्रेशन को सरेंडर करने के लिए आवेदन दिया था। आरबीआई ने टाटा संस को 16 अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (एनबीएफसी) की सूची में भी शामिल किया है, जिसके कारण उस पर कड़ी नियामक निगरानी रहेगी और लिस्टिंग अनिवार्य हो जाएगी। इस मामले पर फिलहाल टाटा संस और आरबीआई की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई है।

संपत्ति और नियामक ढांचा

केंद्रीय बैंक का यह फैसला जून 2026 में उसके स्केल-बेस्ड रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में किए गए बदलावों के बाद आया है। इन नियमों के तहत, किसी भी कंपनी को अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति की सीमा तय की गई थी। 31 मार्च 2026 तक टाटा संस की कुल संपत्ति 2 लाख 1 हजार करोड़ रुपये थी, जो तय सीमा से दोगुने से भी अधिक है। कंपनी ने डी-रजिस्ट्रेशन प्राप्त करने और लिस्टिंग से बचने के प्रयास में अपना सारा कर्ज भी चुका दिया था। हालांकि, आरबीआई की शर्तों के मुताबिक, केवल वही कंपनियां 31 दिसंबर तक डी-रजिस्ट्रेशन के लिए पात्र हो सकती हैं जिनके पास कोई पब्लिक फंड नहीं है, जिनका ग्राहकों से कोई सीधा संपर्क नहीं है और जिनकी कुल संपत्ति 1000 करोड़ रुपये से कम है। टाटा संस इन शर्तों को पूरा नहीं करती है।

2022 से अपर लेयर में शामिल

टाटा संस, जिसका व्यापारिक साम्राज्य स्टील और ऑटोमोबाइल से लेकर वित्तीय सेवाओं और सेमीकंडक्टर तक फैला हुआ है, साल 2022 से ही अपर-लेयर एनबीएफसी की श्रेणी में शामिल है। केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि एक बार जब कोई एनबीएफसी अपर लेयर में आ जाती है, तो उस पर कम से कम पांच साल तक सख्त नियामक नियम लागू रहेंगे, भले ही बाद में वह योग्यता की शर्तों को पूरा न करे। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पहले कहा था कि अपर लेयर एनबीएफसी वर्गीकरण के लिए बदले गए नियम सिद्धांतों पर आधारित हैं और मल्होत्रा ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि उन सिद्धांतों के अनुसार सभी जानते हैं कि सूची क्या है और टाटा संस का अपर लेयर में बने रहना इसी का हिस्सा है।

शापूरजी पलोनजी ग्रुप और टाटा ट्रस्ट्स पर असर

टाटा ट्रस्ट्स, जो सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के माध्यम से टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, ने जुलाई 2025 में एक प्रस्ताव पारित कर होल्डिंग कंपनी को निजी स्वामित्व में ही रखने का निर्णय लिया था। दूसरी ओर, शापूरजी पलोनजी (एसपी) ग्रुप, जो 18 दशमलव 37 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ टाटा संस का सबसे बड़ा माइनॉरिटी शेयरहोल्डर है, कंपनी की लिस्टिंग को वैल्यू अनलॉक करने का सबसे व्यावहारिक तरीका मानता है। एसपी ग्रुप अपने अनुमानित 60000 करोड़ रुपये के कर्ज का कुछ हिस्सा चुकाने के लिए अपनी हिस्सेदारी का कुछ भाग बेचना चाहता है। फंड जुटाने के लिए उसने टाटा संस के कुछ शेयरों को गिरवी भी रखा है, ऐसे में लिस्टिंग से उसे बड़ी राहत मिल सकती है।