FII Exit: भारतीय बाजार से ₹1.78 लाख करोड़ निकले, विदेशी निवेशकों में डर

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से ₹1.78 लाख करोड़ ($19 अरब) की भारी निकासी की है। ईरान-अमेरिका संघर्ष, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और भारत में बढ़ते टैक्स बोझ के कारण वैश्विक फंडों ने अपना रुख बदला है, जिससे निफ्टी में बड़ी गिरावट आई है।

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय इक्विटी बाजारों से बड़े पैमाने पर पूंजी निकालना शुरू कर दिया है। 78 लाख करोड़ से अधिक है, बाजार से निकाल लिए हैं। इस भारी बिकवाली के परिणामस्वरूप निफ्टी अपने 52-हफ्ते के उच्चतम स्तर से 9% से अधिक नीचे गिर गया है। जो भारतीय बाजार कभी वैश्विक निवेशकों की पहली पसंद बना हुआ था, वह अब ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण पूंजी पलायन का सामना कर रहा है।

एलारा सिक्योरिटीज के बाजार आंकड़ों के अनुसार, भारत उभरते बाजारों में एक अपवाद के रूप में उभरा है, जहां लगातार पांचवें सप्ताह भी एफआईआई की ओर से बिकवाली का सिलसिला जारी रहा। इसके विपरीत, अन्य उभरते बाजारों में विदेशी निवेश का प्रवाह स्थिर बना हुआ है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि डॉलर-आधारित निवेशकों के लिए भारतीय बाजार का गणित वर्तमान परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण हो गया है, जिससे संस्थागत डेस्क पर खरीदारी के बजाय सतर्कता देखी जा रही है।

भू-राजनीतिक अनिश्चितता और रणनीतिक ठहराव

ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष में हालिया दो सप्ताह के विराम को बाजार ने पूरी तरह से सकारात्मक नहीं माना है। संस्थागत निवेशकों के अनुसार, यह विराम कूटनीतिक समाधान के बजाय एक रणनीतिक ठहराव अधिक प्रतीत होता है। विदेशी निवेशकों को आशंका है कि संघर्ष का दूसरा चरण अधिक तीव्र हो सकता है, जिससे वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला बाधित होगी। जब तक इस क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति समझौता नहीं हो जाता, तब तक वैश्विक फंड भारतीय जैसे जोखिम वाले बाजारों में नई पूंजी लगाने के बजाय 'न्यूट्रल' रुख अपना रहे हैं। बाजार में आने वाले छोटे उछाल को निवेशक केवल क्षणिक राहत के रूप में देख रहे हैं।

कच्चे तेल की कीमतें और दोहरे घाटे का संकट

ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए 'ट्विन डेफिसिट' (दोहरा घाटा) का खतरा बढ़ गया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में तेल की ऊंची कीमतें चालू खाता घाटे (CAD) को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं। इसके साथ ही, ईंधन की बढ़ती लागत घरेलू मुद्रास्फीति को भी बढ़ाती है। विदेशी निवेशकों को डर है कि यदि महंगाई अनियंत्रित होती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को ब्याज दरों में कटौती के बजाय उन्हें बढ़ाने या स्थिर रखने पर मजबूर होना पड़ेगा, जो आर्थिक विकास की गति को धीमा कर सकता है।

अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और मुद्रा का अवमूल्यन

5% की ओर बढ़ना भारतीय शेयरों के आकर्षण को कम कर रहा है। जब सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बॉन्ड पर अधिक रिटर्न मिलता है, तो विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर वहां ले जाते हैं। इसके अतिरिक्त, डॉलर के मुकाबले रुपए की कमजोरी ने विदेशी निवेशकों के वास्तविक रिटर्न को काफी कम कर दिया है। हाल के सत्रों में रुपए के मूल्य में आई गिरावट ने डॉलर-आधारित निवेशकों के पोर्टफोलियो वैल्यू को नुकसान पहुंचाया है, जिससे वे भारतीय बाजार से बाहर निकलने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

टैक्स प्रणाली में बदलाव और निवेश लागत

केंद्रीय बजट 2024 में घोषित कर संरचना में बदलाव को भी विदेशी निवेशकों के पलायन का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। 5% करने के फैसले ने निवेशकों की शुद्ध आय पर असर डाला है। इसके अलावा, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में बढ़ोतरी ने बाजार में प्रवेश और निकास की लागत को बढ़ा दिया है। वियतनाम, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों की तुलना में भारत की वर्तमान टैक्स व्यवस्था अब वैश्विक फंडों के लिए कम प्रतिस्पर्धी नजर आ रही है।

कॉर्पोरेट अर्निंग्स में गिरावट की आशंका

बाजार में इस बात को लेकर भी चिंता है कि भारतीय कंपनियों की आय (Earnings) में संरचनात्मक गिरावट आ सकती है। भू-राजनीतिक संकट के कारण इनपुट लागत में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग और FMCG सेक्टर के मार्जिन पर पड़ने की संभावना है और आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 के लिए जो दो अंकों की कमाई वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, वह अब खतरे में है। विदेशी निवेशक आधिकारिक तिमाही नतीजों के आने से पहले ही संभावित जोखिमों को देखते हुए अपनी पोजीशन कम कर रहे हैं, जिससे बाजार पर दबाव बना हुआ है।