फ्रांस से भड़की चिंगारी ने तीन महाद्वीपों में मचाया तांडव, क्या दुनिया में आने वाला है भयंकर भूचाल

फ्रांस से शुरू हुई हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की आग अब यूरोप, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका सहित तीन महाद्वीपों तक फैल चुकी है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई, आर्थिक बदहाली और जन-असंतोष के चलते दुनिया भर में हालात विस्फोटक हो गए हैं।

फ्रांस की धरती से भड़की एक छोटी सी चिंगारी ने देखते ही देखते तीन महाद्वीपों को अपनी आगोश में ले लिया है और अब हर तरफ आग ही आग धधक रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या दुनिया में कोई बहुत बड़ा वैश्विक भूचाल आने वाला है और फ्रांस इस वक्त दुनिया का सबसे खूबसूरत देश होने के बावजूद सुलग रहा है और दंगों की राजधानी बन चुका है। यूरोप से उठी दंगों की यह विनाशकारी आग अब अल्बानिया, इटली और बेल्जियम तक पूरी तरह से फैल चुकी है, लेकिन इसका दायरा सिर्फ यूरोपीय महाद्वीप तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि लैटिन अमेरिका से लेकर अफ्रीका महाद्वीप के कई देश भी इस भयानक और विकराल जन-असंतोष की चपेट में आ चुके हैं और आइए विस्तार से जानते हैं कि कैसे फ्रांस से धधकी चिंगारी तीन महाद्वीपों तक पहुंच गई है और इसके पीछे क्या हालात हैं।

फ्रांस में 2400 गिरफ्तारियां और 1000 पुलिसकर्मी घायल

आग की एक चिंगारी और देखते ही देखते तीन महाद्वीपों तक भूचाल फैल गया है और प्रदर्शन का नया केंद्र फ्रांस बना है, जहां की सड़कों पर सुलगता हुआ गुस्सा सरहदें तो बहुत पहले ही पार कर चुका है। यूरोप से लेकर समंदर पार तक, लैटिन अमेरिकी और अफ्रीका महाद्वीप में विरोध प्रदर्शन की आग पूरी तरह से फैल चुकी है। इटली के मिलान से लेकर बेल्जियम के ब्रसेल्स तक की सड़कें जल रही हैं और आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है। यूरोपीय महाद्वीप में आर्थिक बदहाली से भयंकर आक्रोश देखने को मिल रहा है। अल्बानिया में छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा है, तो पुर्तगाल और स्पेन में महंगाई और घर के संकट ने आम लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। पूरा यूरोपीय महाद्वीप इस वक्त आर्थिक बदहाली और जन-आक्रोश के मुहाने पर खड़ा है। दंगों का केंद्र बन चुके फ्रांस में हालात बेहद खराब और डराने वाले हैं। फ्रांस में मचे इस भयंकर बवाल के बीच लगभग 2400 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जबकि हिंसा में करीब 1000 पुलिस अधिकारी घायल हो गए हैं। फ्रांस से हिंसा की बेहद डरावनी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जिन्हें देखकर पूरी दुनिया हैरान है। प्रदर्शनकारियों ने फ्रांस की ऐतिहासिक धरोहरों को भी अपना निशाना बनाया है। लिमोगेस में 19वीं सदी के टाउन हॉल में आग लगा दी गई, जिसे भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। रोलेक्स और लुई वितॉ के स्टोर में जमकर लूटपाट की गई है। इसके अलावा पेरिस के उत्तर-पूर्व में बेलेविले में डार्टी और यवेस सेंट लॉरेंट स्टोर को भी दंगाइयों द्वारा लूट लिया गया है। एक तरफ राष्ट्रपति मैक्रों ने दंगाइयों की कड़ी आलोचना करते हुए उन्हें चेतावनी दी है, तो दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों ने हालात नहीं सुधरने पर अपने प्रदर्शन को और अधिक उग्र करने की खुली धमकी दी है और फ्रांस के इन दंगों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपनी टिप्पणी की है। उन्होंने फ्रांस में फैली इस अशांति के लिए सीधे तौर पर इमिग्रेशन को जिम्मेदार ठहराया है। फ्रांस को सलाह देते हुए उन्होंने कहा है कि वह अपनी सीमाएं बंद कर दे कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।

अमेरिकी और अफ्रीकी महाद्वीप में भी सड़कों पर उतरी जनता

यूरोप के बाद अब अमेरिकी महाद्वीप भी इस वैश्विक असंतोष की भयंकर चपेट में आ चुका है। मेक्सिको से लेकर चिली और कोलंबिया तक सड़कों पर जनता का विशाल सैलाब उमड़ पड़ा है। मेक्सिको में सुरक्षा व्यवस्था, कार्टेल हिंसा और न्यायिक सुधारों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जबकि चिली की राजधानी सेंटियागो में महंगाई और पेंशन सुधार को लेकर छात्र संगठनों और मजदूर यूनियनों ने एक बार फिर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कोलंबिया में सरकारी नीतियों, सुरक्षा और आर्थिक सुधारों को लेकर भारी असंतोष है, जिसके चलते मजदूर संघ और युवाओं ने अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान कर दिया है। केवल यूरोप और लैटिन अमेरिका ही नहीं, बल्कि अफ्रीकी महाद्वीप भी इस वक्त भयंकर जन-असंतोष की चपेट में झुलस रहा है। ट्यूनीशिया, नाइजीरिया, कांगो, केन्या, मॉरीशस और दक्षिण अफ्रीका में अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक कारणों से बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग और डरबन की सड़कों पर भारी हिंसा भड़की है और केन्या में बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों के खिलाफ सड़कों पर जनसैलाब उतरा है। नाइजीरिया से लेकर मेडागास्कर तक, बुनियादी सुविधाओं की कमी और भयंकर आर्थिक बदहाली के खिलाफ युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा है। ऐसे में यह सवाल पूरी मानवता के सामने खड़ा हो गया है कि क्या दुनिया सचमुच किसी बहुत बड़े वैश्विक भूचाल की तरफ तेजी से बढ़ रही है।