1950 का पहला गणतंत्र दिवस: ₹11,093 का बिल और वो ऐतिहासिक जश्न जिसने दुनिया को चौंकाया

भारत के पहले गणतंत्र दिवस का जश्न आज की भव्यता से बिल्कुल अलग था। 1950 में इस ऐतिहासिक दिन पर मात्र 11,093 रुपये खर्च हुए थे। जानिए उस सादगी भरे जश्न की पूरी कहानी और कैसे बदली गणतंत्र की तस्वीर।

भारत आज अपनी सैन्य शक्ति और सांस्कृतिक विरासत के साथ 77वें गणतंत्र दिवस की तैयारियों में डूबा हुआ है। कर्तव्य पथ पर होने वाली भव्य परेड, आसमान में गरजते लड़ाकू विमान और राज्यों की खूबसूरत झांकियां पूरी दुनिया को भारत की बढ़ती ताकत का अहसास कराती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब 26 जनवरी 1950 को देश ने अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया था, तो उसकी तस्वीर आज से बिल्कुल अलग थी और उस समय का जश्न भव्यता से ज्यादा सादगी और जन-कल्याण पर केंद्रित था।

मात्र 11,093 रुपये में हुआ था पूरा आयोजन

आज के समय में गणतंत्र दिवस की परेड पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। हालांकि सरकार आधिकारिक तौर पर हर साल का सटीक आंकड़ा साझा नहीं करती, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक 2015 में यह खर्च लगभग 320 करोड़ रुपये था और इसके विपरीत, 1950 में जब भारत पहली बार गणतंत्र बना, तब कुल खर्च का अनुमान मात्र 11,250 रुपये लगाया गया था। बाद में ऑडिट के बाद यह आंकड़ा 11,093 रुपये निकलकर आया। यह राशि आज के दौर में एक छोटे से पारिवारिक कार्यक्रम के बजट से भी कम लग सकती है, लेकिन उस समय के भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक निवेश था।

बढ़ता गया गणतंत्र का बजट

जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक कद बढ़ता गया, गणतंत्र दिवस के आयोजन का बजट भी बढ़ता चला गया और द हिंदू की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, 1956 में यह खर्च बढ़कर 5. 75 लाख रुपये हो गया। 1971 के युद्ध के समय यह 17. 12 लाख रुपये था और 1988 तक आते-आते यह आंकड़ा 69. 69 लाख रुपये तक पहुंच गया। आज यह खर्च सैकड़ों करोड़ों में है, जो भारत की रक्षा क्षमताओं और तकनीकी प्रगति के प्रदर्शन के लिए आवश्यक माना जाता है।

सादगी और कल्याण का अनोखा संगम

1950 का जश्न केवल परेड तक सीमित नहीं था। पीटीआई के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि दिल्ली प्रशासन ने उस दिन रिलीफ होम्स और ग्रामीण स्कूलों में बेहद सादे लेकिन भावनात्मक कार्यक्रम आयोजित किए थे और उस समय भारत विभाजन के जख्मों से उबर रहा था, इसलिए सरकार का पूरा ध्यान विस्थापित परिवारों, महिलाओं और बच्चों पर था। ग्रामीण क्षेत्रों में जिला बोर्डों ने स्कूलों में कार्यक्रम किए, जहां बच्चों को स्मृति चिन्ह के रूप में स्टील की थालियां बांटी गईं।

कैदियों और महिलाओं के लिए खास इंतजाम

पहले गणतंत्र दिवस पर जेलों में बंद महिला कैदियों और राहत शिविरों में रहने वाली महिलाओं के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई थी। दिल्ली के तत्कालीन मुख्य आयुक्त के कार्यालय की फाइलों के अनुसार, प्रांतीय महिला अनुभाग ने 26 जनवरी 1950 को फल, मिठाई और खिलौने वितरित करने के लिए 750 रुपये की राशि स्वीकृत की थी। दिलचस्प बात यह है कि इसमें से केवल 525 रुपये ही खर्च हुए और 225 रुपये बच गए थे, जिनका उपयोग बाद में अन्य कल्याणकारी कार्यों के लिए किया गया।

विभाजन के बाद का दिल्ली और गणतंत्र

उस समय दिल्ली की स्थिति आज जैसी नहीं थी। कनॉट प्लेस और उसके आसपास के इलाकों में कई महिला हॉस्टल और राहत शिविर थे, जहां विभाजन से प्रभावित लोग रह रहे थे और सरकार ने इन शिविरों में रहने वाली महिलाओं को लाने-ले जाने और उनके बच्चों के लिए जलपान की व्यवस्था की थी। यह सारा खर्च 'राहत और पुनर्वास' मद के तहत दर्ज किया गया था और यह दर्शाता है कि पहला गणतंत्र दिवस किसी शक्ति प्रदर्शन के बजाय एक नए राष्ट्र के निर्माण और उसके नागरिकों की सेवा के संकल्प का दिन था।