सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक से जुड़े विवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को एक उच्च स्तरीय डोमेन विशेषज्ञ समिति गठित करने का आदेश दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि इस समिति का गठन एक सप्ताह के भीतर किया जाना चाहिए। इस आदेश का उद्देश्य पाठ्यपुस्तकों में शामिल सामग्री की समीक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि शैक्षणिक सामग्री तथ्यात्मक और संवैधानिक रूप से सटीक हो। न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार और एनसीईआरटी को विशिष्ट निर्देश जारी किए हैं ताकि भविष्य में इस तरह के विवादों से बचा जा सके।
यह मामला कक्षा 8 की एक पाठ्यपुस्तक के अध्याय में शामिल विवादास्पद सामग्री से संबंधित है, जिस पर कानूनी और शैक्षणिक हलकों में आपत्ति जताई गई थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि पाठ्यपुस्तक में दी गई जानकारी न्यायपालिका और कानूनी प्रक्रियाओं के संबंध में भ्रामक हो सकती है। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए विशेषज्ञों के माध्यम से सामग्री की जांच कराने का निर्णय लिया है। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी संस्थान में कमियां हैं, तो उन्हें इंगित करना भविष्य के लिए सुधारात्मक कदम उठाने में सहायक होता है।
समिति की संरचना और समय सीमा
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा गठित की जाने वाली इस डोमेन विशेषज्ञ समिति में तीन प्रमुख सदस्य शामिल होंगे। इसमें एक पूर्व न्यायाधीश, एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् और एक कानून के विशेषज्ञ को रखा जाएगा। न्यायालय ने केंद्र सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि इस समिति की अधिसूचना एक सप्ताह के भीतर जारी की जाए। यह समिति पाठ्यपुस्तक की सामग्री का सूक्ष्मता से विश्लेषण करेगी और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी और इसके अतिरिक्त, कानूनी अध्ययन पर सटीक सामग्री तैयार करने के लिए नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल से भी परामर्श लेने का निर्देश दिया गया है।
न्यायपालिका की गरिमा और सुधारात्मक कदम
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका की आलोचना और सुधार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि न्यायपालिका में किसी भी अन्य संस्थान की तरह कमियां हैं और उन कमियों की ओर संकेत किया जाता है, तो यह भविष्य के न्यायाधीशों और वकीलों के लिए मददगार साबित होगा। न्यायालय का मानना है कि शैक्षणिक सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो छात्रों को न्याय प्रणाली के बारे में सही और संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करे। मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि वर्तमान में शामिल पक्षों को सुधारात्मक कदम उठाने में सहायता करना ही इस न्यायिक प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य है।
विशिष्ट व्यक्तियों को पाठ्यक्रम निर्माण से बाहर करने का निर्देश
न्यायालय ने इस मामले में एक कड़ा प्रशासनिक निर्देश भी जारी किया है और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और एनसीईआरटी को आदेश दिया है कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, शिक्षक सुपर्णा दिवाकर और कानूनी शोधकर्ता आलोक प्रसन्ना कुमार को स्कूल पाठ्यक्रम तैयार करने की किसी भी प्रक्रिया से बाहर रखा जाए। यह निर्णय कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक के विवादास्पद अध्याय के निर्माण में उनकी कथित भूमिका के मद्देनजर लिया गया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि ये व्यक्ति इस आदेश में किसी भी प्रकार का संशोधन चाहते हैं, तो वे उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से अदालत से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र हैं।
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद के दौरान न्यायपालिका को बदनाम करने के प्रयासों पर भी चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से उन सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्मों की पहचान करने को कहा है जो न्यायपालिका के खिलाफ अभद्र टिप्पणी या भ्रामक जानकारी फैला रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में कहा कि न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना आवश्यक है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे ऐसे तत्वों की पहचान करें और यह भी जांचें कि क्या संबंधित पक्षों ने अब तक बिना शर्त माफी मांगी है या नहीं।
नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के साथ समन्वय
शैक्षणिक सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA), भोपाल की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है। आदेश में कहा गया है कि कानूनी अध्ययन से संबंधित सामग्री तैयार करते समय इस अकादमी के विशेषज्ञों से परामर्श लिया जाना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि स्कूली बच्चों को दी जाने वाली कानूनी जानकारी उच्चतम मानकों के अनुरूप है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शिक्षा और कानून का समन्वय इस तरह होना चाहिए कि वह देश की भावी पीढ़ी को संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूक और शिक्षित बनाए।
