एनसीईआरटी (NCERT) की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के संबंध में की गई टिप्पणियों पर विवाद गहरा गया है और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए विवादित अध्याय के वितरण और शिक्षण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि संस्थान की गरिमा से समझौता नहीं किया जाएगा और इस मामले में बिना शर्त माफी स्वीकार नहीं की जाएगी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी इस घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, जबकि न्यायालय ने इसे एक सोची-समझी साजिश की संभावना के रूप में देखा है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और सुनवाई का विवरण
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका को भ्रष्ट दिखाने का प्रयास एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। पीठ ने टिप्पणी की कि किसी को भी संवैधानिक संस्थानों की छवि धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जस्टिस बागची ने डिजिटल युग का हवाला देते हुए कहा कि पुस्तक की हजारों प्रतियां पहले ही प्रसारित हो चुकी होंगी, जिससे नुकसान का आकलन करना आवश्यक है। न्यायालय ने एनसीईआरटी से पूछा कि इस तरह की सामग्री को अंतिम मंजूरी कैसे मिली और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
एनसीईआरटी पाठ्यक्रम निर्धारण की मानक प्रक्रिया
एनसीईआरटी में पाठ्यक्रम तैयार करने की एक विस्तृत और बहुस्तरीय प्रक्रिया होती है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कक्षा 6 से 12 तक के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी विशेषज्ञ समितियों की होती है, जिन्हें करिकुलम एडवाइजरी ग्रुप्स (CAGs) कहा जाता है। ये समितियां विभिन्न विषयों जैसे इतिहास, भूगोल, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के लिए अलग-अलग गठित की जाती हैं। इन समूहों का प्राथमिक कार्य यह सुनिश्चित करना होता है कि पाठ्य सामग्री राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के सिद्धांतों और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के मानकों के अनुरूप हो।
विशेषज्ञ समितियों और सीएजी की भूमिका
सोशल साइंस के पाठ्यक्रम के लिए मिशेल डैनिनो (Michel Danino) की अध्यक्षता में एक 35 सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। इस समिति में शिक्षाविदों, विषय विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं को शामिल किया गया था। प्रक्रिया के अनुसार, समिति द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट को आंतरिक और बाहरी विशेषज्ञों द्वारा रिव्यू किया जाता है। समीक्षा के बाद, सामग्री को अंतिम रूप देकर एनसीईआरटी के निदेशक के फॉरवर्ड के साथ प्रकाशन के लिए भेजा जाता है। वर्तमान विवाद ने इस पूरी समीक्षा प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं कि कैसे न्यायपालिका विरोधी सामग्री बिना किसी आपत्ति के प्रकाशित हो गई।
नई शिक्षा नीति और गुणवत्ता नियंत्रण के मानक
एनईपी 2020 के तहत एनसीईआरटी को यह निर्देश दिया गया है कि वह छात्रों को तथ्यात्मक और संतुलित जानकारी प्रदान करे। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत सामग्री की सटीकता और संवेदनशीलता पर विशेष जोर दिया जाता है। अधिकारियों के अनुसार, किसी भी अध्याय को शामिल करने से पहले उसे कई चरणों के संपादन से गुजरना पड़ता है। इस मामले में, शिक्षा मंत्रालय ने भी संज्ञान लिया है और यह जांच की जा रही है कि क्या विशेषज्ञ समिति ने निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन किया था। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया है कि भविष्य में ऐसी त्रुटियों को रोकने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र की आवश्यकता है।
जवाबदेही और भविष्य की कानूनी कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एनसीईआरटी को विस्तृत हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है और न्यायालय ने यह भी संकेत दिया है कि वह केवल माफी से संतुष्ट नहीं होगा, बल्कि इसके पीछे के कारणों और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करेगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध इस पुस्तक के पीडीएफ संस्करणों को हटाने के लिए भी निर्देश जारी किए जा सकते हैं। शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, विवादित अंशों को हटाने के बाद पुस्तक का संशोधित संस्करण जारी करने की योजना बनाई जा रही है। फिलहाल, देशभर के स्कूलों को इस विशिष्ट अध्याय को न पढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
