गुवाहाटी टेस्ट में भारतीय क्रिकेट टीम की पहली पारी में सिर्फ 201 रनों पर सिमट जाना एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। यह प्रदर्शन तब और भी निराशाजनक लगता है जब साउथ अफ्रीका ने उसी पिच पर आसानी से 489 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया। कोलकाता टेस्ट में स्पिन के आगे भारतीय बल्लेबाजों के समर्पण के बाद, गुवाहाटी की 'पाटा' पिच पर भी टीम इंडिया के बल्लेबाज संघर्ष करते नजर आए। इस बार स्पिनर्स नहीं, बल्कि साउथ अफ्रीकी तेज गेंदबाज मार्को यानसन ने अपनी गति और उछाल से भारतीय बल्लेबाजों को परेशान किया। यह सवाल अब हर किसी के मन में है कि आखिर भारतीय बल्लेबाज न तो तेज गेंदबाजी खेल पा रहे हैं और न ही स्पिन। इस विफलता के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं, जिन पर गौर करना आवश्यक है।
भारतीय बल्लेबाजी का संघर्ष: एक गंभीर विश्लेषण
गुवाहाटी टेस्ट में भारतीय टीम की पहली पारी में सिर्फ 201 रनों पर सिमट जाना एक चिंताजनक विषय बन गया है, खासकर तब जब साउथ अफ्रीका ने उसी पिच पर आसानी से 489 रन बनाए और यह प्रदर्शन कोलकाता टेस्ट में स्पिन के आगे समर्पण के बाद आया है, जहां टीम इंडिया ने स्पिन-फ्रेंडली पिच पर संघर्ष किया था। अब गुवाहाटी की 'पाटा' पिच पर भी भारतीय बल्लेबाज विफल रहे, लेकिन इस बार साउथ अफ्रीकी तेज गेंदबाज मार्को यानसन ने अपनी गति से उन्हें परेशान किया और यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारतीय बल्लेबाज न तो तेज गेंदबाजी खेल पा रहे हैं और न ही स्पिन। भारतीय क्रिकेट के लिए यह एक ऐसा दौर है जहां टीम की बल्लेबाजी इकाई को अपनी कमजोरियों पर गंभीरता से विचार करना होगा। यह सिर्फ एक मैच का मामला नहीं है, बल्कि यह एक पैटर्न बनता जा रहा है जो टीम के प्रदर्शन को लगातार प्रभावित कर रहा है।
गौतम गंभीर की रणनीति और ऑलराउंडर्स पर दांव
टीम इंडिया की मौजूदा रणनीति के पीछे हेड कोच गौतम गंभीर की सोच मानी जा रही है। गंभीर ने टेस्ट टीम में विशेषज्ञ बल्लेबाजों के बजाय ऑलराउंडर्स पर अधिक भरोसा जताया है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण रवींद्र जडेजा, नीतीश रेड्डी और वॉशिंगटन सुंदर जैसे तीन ऑलराउंडर्स का टीम में होना है। गुवाहाटी टेस्ट में नीतीश रेड्डी को गेंदबाजी में ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया गया और बल्लेबाजी में भी वह असफल रहे और यह रणनीति टीम के संतुलन को प्रभावित करती दिख रही है, क्योंकि विशेषज्ञ बल्लेबाज की भूमिका निभाने वाले खिलाड़ी अपनी मुख्य भूमिका में नहीं दिख रहे हैं। गौतम गंभीर से पहले, भारतीय टीम टेस्ट मैचों में विशेषज्ञ खिलाड़ियों पर अधिक विश्वास करती थी, जिससे उसे अक्सर फायदा होता था। उस समय टीम में ऐसे बल्लेबाज होते थे जो लंबी पारियां खेलने और विकेट पर टिकने की क्षमता रखते थे। हालांकि, अब यह रणनीति बिल्कुल उलट दिख रही है और इसके परिणाम मैदान पर स्पष्ट। रूप से दिखाई दे रहे हैं, जहां टीम की बल्लेबाजी गहराई कमजोर पड़ती जा रही है।
टैलेंट और उम्र के नाम पर टीम का असंतुलन
यह सच है कि हर टीम प्रतिभाशाली और युवा खिलाड़ियों पर दांव लगाना चाहती है, लेकिन इसकी एक सीमा होनी चाहिए और गुवाहाटी टेस्ट मैच के दौरान कमेंट्री करते हुए, पूर्व कप्तान अनिल कुंबले ने इस मुद्दे पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विराट कोहली, रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे और चेतेश्वर पुजारा जैसे अनुभवी बल्लेबाजों के एक साथ टीम से बाहर होने से भारतीय टीम को काफी दिक्कतें हो रही हैं। ये चारों खिलाड़ी 80 से अधिक टेस्ट मैच खेल चुके थे और विशेषज्ञ बल्लेबाज थे। इन खिलाड़ियों ने न केवल रन बनाए, बल्कि युवा खिलाड़ियों को दबाव में खेलने का तरीका भी सिखाया। अब इनकी अनुपस्थिति में युवा खिलाड़ियों पर अत्यधिक दबाव आ गया है, जिसके परिणामस्वरूप वे गुणवत्तापूर्ण गेंदबाजी आक्रमण के सामने बिखर रहे हैं। टीम में अनुभव और युवा जोश का सही संतुलन न होने से टीम की बल्लेबाजी इकाई कमजोर। पड़ रही है, और महत्वपूर्ण क्षणों में कोई भी बल्लेबाज जिम्मेदारी लेने में सक्षम नहीं दिख रहा है।
अति आक्रामक खेल शैली का नकारात्मक प्रभाव
मौजूदा समय में, भारतीय क्रिकेट टीम अत्यधिक आक्रामक क्रिकेट खेलने का प्रयास कर रही है। गुवाहाटी टेस्ट में भी यही प्रवृत्ति देखने को मिली, जहां ऋषभ पंत और ध्रुव जुरेल जैसे खिलाड़ियों ने आक्रामक शॉट खेलने के चक्कर में अपने विकेट गंवाए। टेस्ट क्रिकेट में धैर्य और डिफेंसिव खेल का बहुत महत्व होता है, लेकिन भारतीय बल्लेबाज जल्दी से जल्दी रन बनाने की होड़ में दिख रहे हैं। यह अति आक्रामक खेल शैली टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया को नुकसान पहुंचा रही है। टेस्ट मैच में एक मजबूत डिफेंस की बहुत आवश्यकता होती है, और इस पहलू में भारत के युवा टेस्ट क्रिकेटर काफी पीछे नजर आ रहे हैं। वे गेंद को सम्मान देने और खराब गेंदों का इंतजार करने के बजाय हर गेंद पर प्रहार करने की कोशिश करते दिख रहे हैं। यही कारण है कि टीम को गुणवत्तापूर्ण स्पिन और तेज गेंदबाजी आक्रमण दोनों के सामने चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वे अपनी विकेटें आसानी से गंवा रहे हैं।
टेस्ट विशेषज्ञ बल्लेबाजों की कमी
वर्तमान भारतीय टीम में जो खिलाड़ी खेल रहे हैं, उनमें से कई पूरी तरह से टेस्ट विशेषज्ञ नहीं हैं। साईं सुदर्शन, फॉर एग्जांपल, ने सफेद गेंद क्रिकेट में रन बनाए हैं, लेकिन उन्हें घरेलू क्रिकेट का बहुत अधिक अनुभव नहीं है, खासकर लंबे प्रारूप में और ध्रुव जुरेल भी प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अनुभवहीन हैं, और वॉशिंगटन सुंदर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। ये खिलाड़ी अभी टेस्ट क्रिकेट की बारीकियों को सीखने की प्रक्रिया में हैं। चिंताजनक बात यह है कि करुण नायर, सरफराज खान, अभिमन्यु ईश्वरन जैसे खिलाड़ी, जिन्होंने भारतीय सरजमीं पर काफी रन बनाए हैं और प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अपनी योग्यता साबित की है, वे टीम का हिस्सा ही नहीं हैं। इन खिलाड़ियों को मौका न मिलने से टीम में अनुभव और विशेषज्ञता की कमी साफ झलक रही है और ऐसे में, टीम इंडिया को आने वाले समय में टेस्ट विशेषज्ञ बल्लेबाजों की पहचान करनी होगी और उन्हें मौका देना होगा, अन्यथा इसी तरह के परिणाम देखने को मिलते रहेंगे और टीम को टेस्ट क्रिकेट में लगातार संघर्ष करना पड़ेगा।
